सिनेमा और समाज : 100 वर्ष का सफ़र

‘जीत’ सौ साल पहले मुंबई का ओलंपिया थियेटर एक असाधारण घटना का साक्षी बना था। वह वर्ष था 1913 और महीना था अप्रैल का। शायद भारतीय सिनेमा के पितामह दादा Continue Reading

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न जाने तुम कब आओगे?

जितेन्द्र पाण्डेय ‘जीत” 24 जून, 2005   जी हां, यह वही तारीख़ है, जिस दिन इलाहाबाद विवि को केन्द्रीय विवि का दर्जा प्राप्त हुआ पर आज की ताबीर भी कुछ अलग Continue Reading

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मेरी मां की दास्तां

जितेन्द्र पाण्डेय “जीत” अपने रक्त से सिंचित कर जो हमें जन्म देती है, हर दर्द सहकर जो हमें जीना सिखाती है। जिसके जैसा इस धरा पर कोई भी नहीं, उसी Continue Reading

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आख़िर कब तक?

जीतेन्द्र पाण्डेय  आसाराम, चैतन्य, फलाहारी और रामरहीम जैसे न जाने कितने बाबा और इस समाज में रह रहे हैं, जो अपनी अजरावस्था के बावजूद भी कामवासना और विकृति मानसिकता से Continue Reading

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