26/11 की वो खौफनाक रात

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26/11
  • अंज़र हाश्मी 

नमस्कार दोस्तों आज मैं बात करूँगा एक ऐसी घटना की जिसने पूरे देश में खलबली मचा के रख दी थी और वो दिन है 26/11  जिस दिन मुंबई के ताज होटल को आतंकियों ने निशाना बनाया था और वोह हैवानियत के ६० घण्टे पूरा देश नहीं भूल सकता जिस बेरहमी से आतंकियों ने देश के जाने माने फाइव स्टार होटल में से एक ताज को निशाना बनाया था। क्या दोष था उन मासूम बचो औरतो और और वो निर्दोष लोगो का जो इस आग में अपनी जान गवा गए आज भी उस दहशत वाली काली रात को पूरा मुंबई याद के दुखी होता होगा।

और ऐसा करने के पीछे क्या वजह रही होगी क्या हमने कभी जानने की कोशिश की हैइसका जवाब तो एक इंसान दे सएकता है  से और जिसका इंसानियत से लेना देना है न की और किसी चीज़ से  न की किसी के मज़हब से और आतंकी से पूछा जाता है तो ये सवाल की क्या मिलता है उन्हें बेकसूरों की जान ले के तो वह बोलते है की जंन्नता नसीब होती हुनको लगता है की जिहाद के नाम नाम पर लोगो की जान लेने से जन्नत नसीब होती है इस्लाम नाम पर लोगो का कत्ले आम करना कहा का मज़हब  है और जिहाद करना ही है तो उस ज़हर से करो जो तुम्हारे दिमाग में ज़हर बनता जा रहा। ऐसे लोग जिनके लिए जिहाद करना ही जन्नत के दरवाज़े खोलने के सामान्य है और ये तो तिरस्कार ककरना हुआ।  

मासूमो की जान ले के क्या मिलता है इनको क्या हमने कभी सोचा है इस्लाम मतलब है शान्ति और समर्पण और ऐसी लोग इसकी परिभाषा बदलने की कोशिश  में जुटे रहते है का एक उपाय है जिनके यह बोल के गुमराह किया जाता है की जिहाद करना मतलब बेकसूरों की जनन लेना अरे मेरे दोस्त कौन सी किताब  लिहोती है खा है की खून की बारिश करने से जन्नत नसीब होती है।

इंसानियत से बड़ा धर्म को नहीं है आज ऐसे आतंकियों की वजह से इंसानियत की सर झुकना पद रहा इन बेरहम लोगो के हाथ नहीं कापते होंगे जब ये किसी बेगुनाह की प्राण लेते है क्या इन् के दिल नहीं है और ये सिर्फ नफरत की आग में इतना झुलस जाते  है की जिहाद के नाम पे ऐसी खतरनाक घटना को अंजाम देते है और इस घिनोने घटना को अंजाम दे के जिहाद का नाम लेते है । धर्म के नाम पे ऐसे लोग आतंक को बढ़ावा देते है यह कसूर है उनकी मानसिकता का जो इनको मजबूर करती है इनसािनयत का दुश्मन बनने पर ।

मुझसे भी यही सवाल पूछा जाता है की इस्लाम का आतंकवाद से कोई लेना देना नहीं परन्तु हर मुसलमान ही क्यों आतंकी  होता है एमरे अनुसार अगर  आप आप इसको धर्म के तौर पर नहीं इंसानियत की तरह यह सवाल देखे तो आपको इसका जवाब अवश्य मिल जाएगा। हम और इंसानियत से बड़ा धर्म धर्म कोई हो ही नहीं हो सकता संसार के लोगो को धर्म कही आगे हटके सोचना होगा हमको ऐसे सोच और कूटनीतियों को सदैव  के लिए ख़त्म करना होगा ताकि हम सब शान्ति से जी सके कब तक धर्म के नाम पर जाती भेद भाव होते रहेंगे चार बाते बोलने से कोई इंसान नहीं बन जाता मनुष्य की पहचान होती है उसके कर्मो से ना की उसके धर्म से।

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