मेरी कलम से…..- अच्छा सा लगता है!!!

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अच्छा सा लगता है!

तेरा यूं ही मुस्कुरा जाना ,
अच्छा सा लगता है!
मेरी बातों में तेरा यूं ही आ जाना,
अच्छा सा लगता है!
कभी चूड़ी की खनखन से,
कभी पायल की छन-छन से,
मेरे गलियों में आ जाना,
अच्छा सा लगता है!
तेरा दीदार करने को,
बहकती बात करने को,

तेरा सपनों में आ जाना,
अच्छा सा लगता है!
तेरे नैनों का वो काज़ल,
तेरे होंठो की वो रंगत,
तेरा खुलकर यूं इतराना,
अच्छा सा लगता है!
तू चुपचाप बैठी है,
मैं भी गुमशुम सा बैठा हूं,

बेवजह नज़रों का मिल जाना,
अच्छा सा लगता है!
कभी इकरार होता है,
कभी इनकार होता है,
पल दो पल का ये अफसाना,
अच्छा सा लगता है!
तुम्हारे रूठ जाने से,
मेरे कुछ पास आने से,
तेरा बिन बोले चले जाना,
अच्छा सा लगता है!
ख्वाबों में, ख्यालों में,
मोहब्बत के हवालों में,

तुम्हारा नाम आ जाना,
अच्छा सा लगता है!
तुम्हारे संग संग चलना,
तुम्हीं को देखते रहना,
तुम्हें नाराज़ कर देना,
अच्छा सा लगता है!
तुम्हारी बेरुखी पे भी,
तुम्हारी आरज़ू करना,
कभी खुद रूठ भी जाना,
अच्छा सा लगता है!
मेरे ख्वाबों के लम्हें में,
मेरे हर एक पन्नें में,
क़लम का यूं ही चल जाना,
अच्छा सा लगता है!!!

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