हिंदी दिवस : हक़ीक़त के नज़रिए से

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आज हिंदी सरकारी प्रयत्नों के बावजूद भी उपेक्षा की शिकार है क्योंकि अंग्रेजी अब लोगों के स्टेटस से जुड़ चुकी है। आज अंग्रेजी बोलने वाले को हिंदी बोलने वालों की तुलना में ज़्यादा सभ्य, प्रज्ञ और आधुनिक माना जाता है। हिंदी प्रयोग करने वाले को पिछड़ा, दकियानूस के साथ ही उनसे नाक-भौं सिकोड़ी जाती है। इस दिखावे की दुनिया में हिंदी कहीं गुम-सी हो गयी।

आइए मेरी नज़र में हिंदी की इस दुर्दशा के कारणों पर भी एक नज़र डालते हैं –

  1. अंग्रेजी मानसिकता – हम लोग आज भी आज़ादी के इतने वर्षों बाद भी गुलाम ही हैं। हमें अंग्रेजी सभ्यता संस्कृति अच्छी लगती है औऱ अपनी सारी परंपराएं व्यर्थ लगती है।
  2. भ्रष्ट राजनीति – दक्षिण भारत में हिंदी के छा जाने का हौवा और अंग्रेजी के चलन को जोर देने की मंशा ने वोट बैंक के ख़ातिर भाषा में भी राजनीति का पुट डाल दिया।
  3. सरकारी अफ़सरशाही का षड़यंत्र – आज़ादी के बाद सरकार के बड़े-बड़े अधिकारियों ने जानबूझ कर हिंदी की बजाय अंग्रेजी का वर्चस्व बनाए रखा जिससे उनकी अंग्रेजीदां संतानें ऊंचे पदों पर नियुक्त होकर देश की धन-संपत्ति का मुक्त भोग करती रहें। कैसा दुर्भाग्य है कि आज़ादी के बाद भी कुछ वर्षों तक देश की सबसे बड़ी परीक्षा आई. ए. एस. तक में परीक्षा का माध्यम अंग्रेजी ही रहा था।
  4. हिंदी में श्रेष्ठ पठनीय सामग्री का अभाव – हिंदी की पत्र-पत्रिकाएं अंग्रेजी के सामने कहां ठहर पाती हैं? हिंदी पाठक भी इसके लिए जिम्मेदार हैं। वे अच्छे साहित्य को पढ़ने की रूचि भी तो नहीं जगाते।

क्या हिंदी राष्ट्रभाषा है?

भारत में अभी तक किसी भी भाषा को राष्ट्रभाषा के रूप में नहीं माना गया है। भारत के संविधान के अनुच्छेद – 343 में यह घोषणा की गई कि “देवनागरी लिपि में हिंदी भारत की राजकीय भाषा यानी राजकाज की भाषा होगी। आगे धारा 351 में कहा गया कि “संघ सरकार का यह कर्तव्य होगा कि वह हिंदी के प्रचार का प्रयत्न करे और उसे इस तरह विकसित करे कि वह भारत की संश्लिष्ट संस्कृति के सभी तत्वों की अभिव्यक्ति का माध्यम बन सके।

संविधान की धारा 343 में यह भी घोषित किया गया कि संविधान लागू होने की तिथि से 15 वर्ष आगे तक राजकाज के लिए अंग्रेजी भाषा का प्रयोग किया जाए। ऐसा इसलिए कहा गया क्योंकि तब तक हिंदी का इतना प्रचार-प्रसार और विकास नहीं हो पाया था कि राजकीय कार्यों के लिए उसका प्रयोग किया जा सके। 1950-1965 तक भारत सरकार ने यद्यपि प्रयत्नों की खानापूरी की किन्तु स्थिति यथावत बनी रही। हिंदी अंग्रेजी की दासी बनी रही। उसे पूरी तरह राजभाषा का सम्मान भी नहीं मिल पाया।

भारतीय संविधान का निर्माण करने वाले डॉ. भीमराव रामजी अम्बेडकर चाहते थे कि संस्कृत इस देश की भाषा बने लेकिन अभी तक किसी भी भाषा को राष्ट्रभाषा के रूप में नहीं माना गया है। भारतीय सरकार ने 22 भाषाओं को आधिकारिक भाषा के रूप में जगह दी है, जिनमें हिंदी और अंग्रेजी के साथ-साथ अन्य 20 भाषाएं शामिल हैं। 1881 में हिंदी को आधिकारिक भाषा के रूप में स्वीकार करने वाला सबसे पहला राज्य बिहार था। राज्य सरकार अपने अनुसार किसी भी भाषा को आधिकारिक भाषा के रूप में चुन सकती है।

एक नादान कलमकार होने के नाते व्यक्तिगत सोच

क्या लिखूं मैं तेरी तारीफ़ में। तुमसे से ही तो मेरा वज़ूद है। मैंने माँ भी बोला तो तेरे रंग में और पहली बार रोया भी तो तेरे रंग में। तेरा रंग ही कुछ ऐसा चढ़ा कि तेरे बिना अधूरा-सा लगता है। तू पास होती है तो लगता है बस मैं दुनिया का सबसे ख़ुशनसीब इंसान हूँ। माँ तो बोलना सिखाती है पर तू भी तो माँ ही है न जो बच्चों के बोलने का माध्यम बनती है। कुछ नासमझ और एहसान फ़रामोश मानसिकता वाले लोग तो ये तक कहते हैं कि भारत में जिसे भी माँ का दर्ज़ा दिया गया, उसकी धज्जिया उड़ा दी गयी पर एक सवाल ऐसे लोगों से कि आख़िरकार उन्होंने अपने स्तर पर क्या किया? सिर्फ़ बोलने से ही माँ नहीं हो जाती। माँ की सेवा करनी पड़ती है औऱ इबादत करनी होती है। इतना आसान नहीं दुनिया में कुछ कर गुज़रना नहीं तो आज हिंदी भारत की राष्ट्रभाषा होती जनाब। आज आधुनिकता और दिखावे की राजनीति के चक्रव्यूह में तू ऐसी फंसी है न कि देश की राजकीय और राष्ट्रीय भाषा बनना तो दूर तू अपने अस्तित्व की ही लड़ाई लड़ती प्रतीत होती है पर चिंता न करना माँ। हम सब हैं न हम तुझे अमर कर देंगे। कुछ ऐसा कर जाएंगे कि लोग तेरा इस्तकबाल तो करें ही साथ ही तुझसे न चाहकर भी मोहब्बत भी हो जाएगी। वैसे तेरे लिए सिर्फ़ एक दिन नहीं हर एक दिन है। बस यूं ही साथ रहना क्योंकि जो वात्सल्य तू देती है न वो अन्य भाषाओं से मिलता नहीं। किसी अन्य भाषा में वो सुकून और प्यार वाला अपनापन मिलता नहीं।

हिंदी को अपना स्थान तभी मिल पाएगा जब देश में स्वस्थ राजनीति होगी। सरकारी स्तर और स्वैच्छिक स्तर पर इसके उत्थान के लिए कार्य किया जाएगा। अन्यथा एक दिन हिंदी दिवस मना लेने या हिंदी पख़वाड़ा में हिंदी से जुड़े कार्यक्रमों का आयोजन करा लेने से हिंदी की स्थिति कभी नहीं सुधर सकती।

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