हमारी राष्ट्र भाषा

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सामान्य एव व्यावहारिक भाषा ही राष्ट्रभाषा कहलाती हैहमारे देश के लोग अपनी राष्ट्र भाषा का उपयोग करने में ही गौरव समझते हैं। माना जाता है कि एक भारत ही ऐसा देश है जिसे स्वतंत्रता के 70 वर्ष बीतने के बाद भी राष्ट्र भाषा की चर्चा एक समस्या के रूप में करनी पड़ती हैभारत के लोग आश्चर्यचकित तब होते हैं जब कोई विदेशी हमारी राष्ट्र भाषा में बात करने की कोशिश करता है

राष्ट्र भाषा तो वही हो सकती है जिसका अतीत उज्जवल रहता हो जो भी हमारी संस्कृति है उसी को हम भारतवासियों की  शान के रूप में स्वीकार करना होगा । भारत एक ऐसा देश है जहां पर हर जाति – धर्म के लोग रहते हैं और उनकी भाषा भी भिन्न – भिन्न होती हैअगर बात करें मलयालम तो ये साउथ वाले बोलते हैं। यू पी में हिंदी भाषा का प्रयोग होता है। भारत के जितने राज्य हैं सारे ही राज्यों की क्षेत्रीय भाषा अलग होती है लेकिन भारत में हिंदी बोलने वाले बहुत लोग हैं जो अपनी मात्र भाषा का ही प्रयोग करने में अपनी शान समझते हैं।

हमारा देश 15 अगस्त 1947 से पहले तक जब अपनी स्वतंत्रता पाने के लिए संघर्ष कर रहा था, राष्ट्रीय नेताओं की सर्वसम्मति से तभी यह निश्चय कर लिया था कि उपर्युक्त गुणों से संपन्न होने के कारण हिंदी ही स्वतंत्र भारत की राष्ट्रभाषा होगी। इसी कारण तब उत्तरदक्षिण सभी जगह हिंदी का प्रचारप्रसार एक राष्ट्रीय कर्तव्य मानकर किया जाता रहा। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद सन 1952 में जब हमारा संविधान बना और लागू किया गया, तब भी हिंदी को ही राष्ट्रभाषा के रूप में मान्यता दी गई।

पर हमारे पंडित जताहर लाल नेहरु जैसे उच्च नेता तक गलती कर बैठे। उन्होंने राष्ट्रभाषा को जारी होने के लिए अकारण ही पंद्रह वर्ष का समय रख दिया। इन पंद्रह वर्षों में शीर्षस्थ राजनेताओं की आपस की खींचतान के कारण राष्ट्रभाषा जैसे सर्वसम्मत बात ने भी उत्तरदक्षिण का प्रश्न खड़ा कर दिया।

अपनी भाषा ही सबको जोड़ सकती हैं यानी एक ही भाषा अगर पूरे देश में  होती है तो हमारी संस्कृति भी बची रहेगी और शिक्षा की बात करें तो एक भाषा में वार्तालाप करने से हम एक – दूसरे के साथ अच्छी तरह से घुल मिल सकते हैं । मेरे हिसाब से देश में राष्ट्रभाषा को आवश्यक कर देना चाहिए।

10 COMMENTS

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