सूफ़ी विचारधारा क्या है?

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अयं शाश्वतो धर्मः एको धरायां। न सम्भाव्यते धर्मतत्वेषु भेदः।

धरा में एक ही शाश्वत धर्म है- जीवन का सफल नियमन तथा आनन्दपूर्ण अवसान। भारतीय दर्शन इतिहास में हम देख चुके हैं कि ब्राम्हणकाल (कर्मकाण्ड) के पश्चात् उपनिषद्काल (विचार काल) का प्रादुर्भाव हुआ। कर्मकाण्डों के पीछे जो वैचारिक भावना निहित है, उपनिषदों के माध्यम से उसका प्रचार-प्रसार हुआ। ठीक उसी प्रकार तसव्वुफ़ या सूफ़ी दर्शन भी इस्लाम का आन्तरिक स्वरूप है, जिसे कुरान में ‘इस्मे सीना’ के नाम से अभिहित किया गया है। सूफ़ी दर्शन विशुद्ध इस्लाम धर्म का उपनिषद् है, जिसमें उपनिषदों के समान ही ब्रम्ह प्राप्ति का ज्ञान निहित है। इसी तथ्य को मारूफ अलकरखी ने भी सूफ़ीमत की परिभाषा करते हुए उद्घाटित किया है। उनका कहना है कि परम सत्य का ज्ञान प्राप्त करना ही तसव्वुफ़ है और इसीलिए मुस्लिम रहस्यवादी अपने को ‘अहल अल-हक्क’ कहते हैं।

इस्लाम का सामान्य अनुयायी जबकि अपनी मृत्यु के पश्चात् कयामत के दिन ईश्वर की कृपा का पात्र बनकर हूरों के प्रदेश में जाकर परम ऐश्वर्य तथा भोग विलास को ही अपने जीवन का चरम लक्ष्य या अन्तिम अभिलाषा समझता है, इसके ठीक विपरीत सूफ़ी साधक परमतत्व में आत्मालय को अपना परम लक्ष्य मानता है, जो हिन्दू दर्शन के मोक्ष के सिद्धांत के ही समान है।

सूफ़ी विचारधारा के लोग अति प्राचीन काल से मिलते हैं किन्तु सूफ़ीमत अपेक्षाकृत नवीन है। कुछ लोगों ने तो आदम को ही प्रथम सूफ़ी माना है। सूफ़ी विचारधारा ने दर्शन का स्वरूप पैगम्बर की मृत्यु के दो सौ वर्षों बाद धारण किया। मोटे तौर पर सूफ़ियों का चरम लक्ष्य परम प्रिय का मिलन ही रहा है, जिसके लिए उन्होंने बिना किसी लीक का अनुसरण किए वैयक्तिक प्रयत्न किये। अतः सूफ़ी शब्द की उत्पत्ति तथा उनके दर्शन के विषय में विद्वानों ने अनेकानेक व्याख्याएं प्रस्तुत की हैं। फरीदुद्दीन ने तो अपनी पुस्तक में सूफ़ी मत की सत्तर परिभाषाएं प्रस्तुत की है। इन विभिन्न प्रकार की परिभाषाओं से सूफ़ियों की तीन स्थितियों का स्वरूप उद्भाषित होता है- 1. ब्रम्हाचार  2. अंतःचार 3. चरम लक्ष्य। अपने ह्दय की पवित्रता तथा सच्चरित्रता के कारण साधक सूफ़ी कहलाए। हुज्विरी विसर इब्न अल हारिथ कहता है- सूफ़ी वह है जिसका ह्दय ईश्वर के प्रति सच्चा (सफा) है। एक अन्य सूफ़ी का मत है कि सूफ़ी वह है, जिसका आचरण ईश्वर के प्रति सच्चा है और जिसे ईश्वर की सच्ची कृपा प्राप्त है।

इन परिभाषाओं से यह स्पष्ट है कि ह्दय की पवित्रता तथा सच्चरित्रता से पूरा शरीर परिष्कृत हो जाता है किन्तु यदि ‘सफा’ शब्द से ‘सूफ़ी’ की उत्पत्ति मानी जाए तो उसका रूप ‘सफानी’ होगा सूफी नहीं।

कुछ विचारकों का मत है कि अपने विचारों की उच्चता, ह्दय का ईश्वर के प्रति अधिक लगाव तथा अपने मन को ईश्वर के प्रति अधिक समय तक केन्द्रित करने वाले वे व्यक्ति जो ईश्वर के समक्ष प्रथम पंक्ति (सफ्फ) में बैठते थे, सूफ़ी कहलाये। यहां भी द्रष्टव्य है कि व्याकरण की दृष्टि से ‘सफ्फ’ शब्द से ‘सफ्फी’ बनेगा सूफ़ी नहीं।

सूफ़ी शब्द  व्युत्पत्ति तथा सूफ़ी मत के विवेचन सम्बन्धी वैचारिकों की यह धारणा कि सूफ़ी शब्द ‘सूफ’ से बना है, अधिकांश विद्वानों को मान्य है। सूफ़ी शब्द अरबी के सूफ शब्द से निकला है, जिसका अर्थ है- ऊन। सूफी शब्द का प्रचलन यूनानी भाषा में पवित्र ज्ञान के लिए प्रचलित सोफिया शब्द से हुआ, ऐसा माना जाता है और इस्लामिक मान्यता है कि मदीना की मस्जिद के सामने एक ‘सुफ्फा’ अर्थात् चबूतरा था, जिस पर बैठकर जो संत प्रभु का ध्यान लगाते थे, वे सूफी कहलाए। इस्लाम धर्म के मंच से विकसित होने वाला सूफी दर्शन का एक प्रमुख धर्म है, जो इस्लाम दर्शन पर ही मूलतः आधारित है। सूफी संत बहुत ही पवित्र जीवन व्यतीत करते थे। इन संतों में अलौकिक शक्तियों का समावेश था। इसलिए इनके प्रति जनसाधारण में अत्यधिक श्रद्धा भाव उत्पन्न होती थी। हिन्दू और मुसलमान दोनों में ही सूफियों के प्रति असीम श्रद्धा और विश्वास जाग्रत हुआ। बाबा फरीद, निजामुद्दीन औलिया, जियाउद्दीन, शेख शिहाबुद्दीन सुहरावर्दी, ख्वाजा बाकी बिल्लाह, ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती आदि सूफी मत के प्रवर्तक थे।

भारतवर्ष में चार प्रमुख सूफी सम्प्रदाय हैं- चिश्तिया, कादरिया, सोहरावर्दिया और नक्सबंदिया। जिनके अपने महत्व हैं, जिस आधार पर वो एक-दूसरे से भिन्न हैं। उत्तरी भारत में पहले पहल आने वाले सूफियों में शेख इस्माइल का नाम आता है। यह सन् 1005 में लाहौर में आए। इन्होंने बहुत से लोगों को अपनी आध्यात्मिक शक्ति का प्रदर्शन करके मुसलमान बनाया। विद्वानगण भारत के प्रथम सूफी  रूप में मानते हैं।

जिस प्रकार भागवत धर्म की बेली मध्य युग के वैष्णव संत कवियों की वाणी में पल्लवित पुष्पित हुई ठीक उसी प्रकार इस्लाम की सूफी परम्परा के अंतर्गत संतों और फकीरों की मजारों पर सोज और सभा की परम्परा विकसित हुई है। सूफी संगीतानुरागी थे। कहा जाता है कि कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी का स्वर्गवास भक्तिपरक संगीत सुनते-सुनते हुआ था। अमीर खुसरो जैसे महान संगीतज्ञ इसी परम्परा के थे। भारत के सूफी संतों की निजामुद्दीन औलिया की शिष्य परम्परा में सन् 1492 में मलिक मोहम्मद जायसी का आविर्भाव हुआ, ये प्रेम की पीर के अमर गायक सूफी काव्यधारा के सर्वश्रेष्ठ कवि थे। स्तुति खंड में कवि ने लिखा है कि

हौं पंडित न केर पछलंग, किहु काहंचला तबल देई डगा।

पद्मावती वियोग खंड में विरह में तड़पती नायिका रात्रि काटने के लिए वीणा का सहारा लेती है। उन्होंने राजा बादशाह युद्ध खंड में 6 राग 36 रागिनियों की चर्चा की है।

‘चिल्हवाँस’ मध्ययुग कं सूफी कवियों ने अनेक स्थलों पर प्रयुक्त किया है किन्तु इसका अर्थ पुनर्विचार की अपेक्षा रखता है। जायसी-कृत पद्मावत में यह शब्द इस प्रकार प्रयुक्त हुआ है-

भई पुछारि लीन्ह बनवासू,

बैरनि सवति दीन्ह चिल्हवाँसू। (छन्द 358.1)

मंझनकृत मधुमालती में भी यह शब्द आता है-

कै तोर अरथ दरब हरि लीन्हा,

कै चिल्हवाँस सत्रु तोहि दीन्हा। (छन्द 190.3)

डॉ. वासुदेवशरण अग्रवाल ने पद्मावत में इसका अर्थ ‘चिड़िया फंसाने का फंदा’ बताया है।

 

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