सुन्दर घर

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“घर” शब्द की कल्पना करते ही हमारे समक्ष इट ,पत्थर , दारे से  बना हुआ एक ढांचा नज़र आता है | घर वैसे तो एक जगह है जहाँ जीव रहता है अब चाहे गाय के लिए गौशाला , घोड़े के लिए अस्तबन परन्तु बात जब मनुष्य की हो तो कुछ अनोखापन आ जाता है | वास्तव में घर मनुष्य के लिए वरदान स्वरुप है क्यूंकि एक घर को वास्तविक स्वरुप एक मनुष्य ही प्रदान कर सकता है | यथार्थ तो यह है कि सुन्दर घर का पर्याय हवेली या कोठी नहीं हो सकती है | घर में सुंदरता तभी रहती है जब उसमे रहने वाला व्यक्ति मानसिक व शारीरिक रूप से सुखी हो क्यूंकि अमीरों के घरो में द्वेष -कलेश आदि नकारात्मक तत्व ज़्यादा आसीन होते है |

आदमी यदि आदिवासी हो तो जंगलो या गुफा में रहेगा , ग्रामीण हुआ तो कुटिया या कच्चे घर में , छोटे शहर में हुआ हुआ तो मकान या ईट से बने छोटे से घर में और अमीर हुआ तो कोठी , हवेली , या बंगला उसकी शान बढ़ाएगा पर हाँ बाकी जीवों के लिए सिर्फ रहना ही एक वजह होगी वहीँ मनुष्य ही एक मात्र ऐसा जीव है जिसके लिए शुरुआती वजह घर में रहना होना हो सकती है लेकिन अपनी हैसियत , जीवन स्तर आदि मापदंडो पर यह वजहें शान -शौकत तक पहुंच जाती है | वाकई मनुष्य एक नायाब जीव है !

हमारे भारतीय परंपरा में अतिथि को “अतिथि देवो भव : ” की संज्ञा दी गयी है यानी की अतिथि को भगवन के बराबर माना गया है | किसी भी अतिथि को अगर अपने घर में रुकवाया जाता है तो उसमे एक अपनत्व की भावना पनपती है और सम्बन्ध पारिवारिक हो जाते है | आज जबकि पश्चिम की संस्कृति में आज जहाँ लोग होटलों ,गेस्ट हाउस या धर्मशाला में रुकवा देते हैं और उसका भुक्तान भी अतिथि के द्वारा ही देय होता है जो कि भारतीय संस्कृति के विरुद्ध है | यहाँ घर में दो रोटी ही है तो अतिथि एवं घर के सदस्य आपस में भोजन ग्रहण करते हैं | इससे जहाँ अतिथि परदेस गामी है तो उसके देश कि संस्कृति व खानपान से भी हम परिचित हो जाते हैं और हमारे खानपान और संस्कृति से वह भी परिचित हो जाता है | यानी कि घर वह स्थान है जहाँ दो देशों की संस्कृति ही नहीं खानपान ही नहीं , रहन -सहन ही नहीं , भाषा – संवाद ही नहीं ,अपितु वहां की सांस्कृतिक विचारधारा से भी रूबरू हो जाता है |

 

घर ही वह स्थल है जिसे इसके सदस्य या इसमें रहने वाले लोग ही मिलकर बनाते है | एक आदर्श घर वह है जिसमे परिवार के सभी सदस्य एक छत के नीचे रहते हो और सभी अपने अपने कर्तव्यों की इत्श्री करते हुए और सभी एक दूसरे का उचित सम्मान एवं प्यार करते हुए मिलकर रहते हैं वही घर स्वर्ग बन सकता है जहाँ बुजुर्गो का सम्मान होता है और उनके कुशल न्रेतत्व में परिवार के सदस्य -गण अपने अपने क्षेत्र में बुजुर्गो के मार्गदर्शन में आगे चलते है और सफलतापूर्वक अपने कार्य को सम्पादित करते हैं | अगर हमें घर को आदर्श घर बनाना है और हमें उच्च आदर्शो वाला जीवन जीना है  तो हमें राम और रामायण से सीख लेनी होगी क्यूंकि घर परिवार को एक रखने का सत्य इसी में है | रामचरितमानस में हमें राजा और प्रजा के प्रति क्या सम्बन्ध होना चाहिए , पिता -पुत्र के बीच में कैसे सम्बन्ध होने चाहिए , भाई -भाई के बीच में कैसे सम्बन्ध होने चाहिए , राजा -मंत्री के बीच में कैसे सम्बन्ध होने चाहिए मित्र -मित्र में सम्बन्ध कैसे होने चाहिए , पति-पत्नी के बीच में कैसे सम्बन्ध होने चाहिए , राजा -सेवक के बीच में कैसे सम्बन्ध होने चाहिए यहाँ तक की दुश्मन के प्रति क्या भाव होना चाहिए  रामचरितमानस से अच्छा यह कहीं भी वर्णित नहीं है |

मेरा देश ही मेरा घर है जब यह भावना आत्मसात हो जाती है तब अपना पूरा देश अपना एक परिवार लगने लगता है यह भावना देशप्रेम के माध्यम जागनी पड़ती है | देश ही नहीं पूरे विश्व को अपना घर मानना चाहिए यह सिर्फ भारतीय संस्कृति में ही है जहाँ हम “वसुधैव कुटुम्बकम ” को मानते है यानी पूरा विश्व परिवार है और यह भारत ही एक मात्र देश है जिसने सभी धर्मो का घर बनना स्वीकार किया और यह ही वह देश है जो विश्व कल्याण की कामना करता है | यदि हम संकुचित विचारधारा के आधार पर यदि अपने घर को ही परिवार मान बैठते हैं तो व्यक्ति देश के लिए कुछ नहीं कर पाता इसलिए हम भारतवर्ष को भारतमाता के रूप में देखते है और उसकी वंदना करते है | जब हम अपने देश को मातृभूमि मान लेते है तब माँ-पुत्र का भाव उत्पन्न हो जाता है | पुत्र के नाते व्यक्ति अपने देश के लिए  अपने प्राण तक न्योछावर कर देता है |

कोई कारागृह घर इसलिए नहीं हो सकता क्यूंकि कारागृह ज़ुल्म करने के पश्चात पाई हुई सज़ा काटने का स्थान है , वह बंदीगृह है , वह चारदीवारी और सुरक्षा से घिरा हुआ वह बंदीगृह है जो हमें अनुभूति करता रहता है कि तुम कैदी हो , एक मुजरिम हो , सज़ायाफ्ता हो , पश्च्याताप  के लिए बंदीगृह हो सकता है घर कदापि नहीं | घर और कारागृह कि तुलना हो ही नहीं सकती | घर जहाँ स्वर्ग है वहीँ कारागृह सज़ा काटने का स्थान |

कारागृह में आप के अलावा आपके परिवार का कोई सदस्य नहीं रह सकता न ही बिना अनुमति के मुलाक़ात कर सकता है और न ही वह आपसे कोई संवाद कायम कर सकता है पर हाँ बंदीगृह के अधिकारियों से अनुरोध कर दूरभाष द्वारा अथवा घर के सदस्यों के अनुरोध पर छणिक मुलाक़ात हो सकती है | कारागृह नाम से ही अपराधी होने का बोध हो जाता है जबकि घर का नाम लेने मात्र से ऐसा बोध या ऐसा आभास नहीं होता |बंदीगृह में आपसे मुजरिमो के अलावा किसी अच्छे व्यक्तित्व से मुलाक़ात संभव नहीं है जबकि घर  में ऐसा नहीं है इसलिए तमाम ऐसे कारण है कि कारागार एक घर हो ही नहीं सकता ,कदापि नहीं |

माँ के स्नेहिल वर्चस्व में उसका प्यार बेटे की देख-रेख ,उससे लगाव और उसकी चिंता बैगैर आपस में संवाद हुए संभव नहीं है , माँ और बेटे किसी नदी के दो कगार से है | दोनों के स्नेह ,प्रेम ,श्रद्धा , आदर में आगे न बढ़ने पर  जिस प्रकार से कोई नदी स्वछ्दं होकर प्रवाहित नहीं हो पाती उसी प्रकार संवादविहीनता में अनुराग और श्रद्धा केवल एक के पास ही प्रकाशित हो पाती है | अगर यह प्रकाश दोनों में प्रकाशित हो तो दोनों में स्नेह -प्रेम अमरता की दिशा में बढ़ता जाता है जो माता – पुत्र का

सुख- दुःख में एक रूप एवं समस्त अवस्थाओं में अनुगत होता है वहां दिल से प्रेम जागृत होता है |जहाँ पर प्रीत जरावस्था में भी अक्षुण रहती है जो बचपन से शुरू होकर युवा अवस्था तक तथा विवाह से लेकर मृत्यु पर्यन्त उत्कृष्ट प्रेम भाव में अवस्थित होता है | माँ – बेटे के बीच विभेद की सीमा रेखा नहीं है | सभी के अाचार -व्यवहार मानवोचित है | माँ और बेटे को एक दूसरे से अलग कर पाना नामुमकिन ही नहीं असंगत प्रयास होगा |

यह परंपरा पौराणिक सभ्यता में थी कि  बाज़ार और  बाइय का जिम्मा मात्र केवल पिता उठाता था अब जबकि पुरुष और स्त्री को बराबर का दर्जा प्राप्त हो चुका है तो पुरुष के साथ -साथ महिलाएं भी कंधे से कन्धा मिलाकर कदम ताल कर रहीं है चाहे वह व्यापर , सेना , न्यायिक , पुलिस ,खेल , राजनीति , कला  या यहाँ तक कि अंतरिक्ष ही क्यों न हो वहां पर महिलाएं और पुरुष समान रूप से अपनी सेवा अर्पित कर रहे तो यह कहना बेईमानी होगी आज के सन्दर्भ में कि बाज़ार और  बाइय  बल्कि माँ और पिता दोनों मिलकर ज़िम्मेदारियों को उठाते है चाहें वह फिर आंतरिक या बाहरी मामला हो | माता और पिता दोनों मिलकर कमाते है और बच्चो सहित जो भी पारिवारिक जरूरतें हो उन्हें समान रूप से पारिवारिक ज़रूरतों को पूरा करने के लिए क्षमता अनुसार दोनों अपने -अपने कर्तव्यों का निर्वहन करते है और कुशलतापूर्वक परिवार का भरण -पोषण करके अपने अपने कर्तव्यों का निर्वाहन करते है |

हम अपने घर को सुन्दर तभी बनाये रख सकते है जब हम उसमे रहने वाले हर सदस्य की भावनाओ की कदर करे और उनके विचारो को समझने का प्रयास करे  और ज़रुरत है  कि हम उनकी इच्छा या अनिच्छा का सम्मान करे | हमें अपनी इच्छा को  ज़बरजस्ती नहीं थोपना चाहिए क्यूंकि ज़रुरत से ज़्यादा अनुशासन से घर के सदस्यों के बीच मतभेद पैदा हो सकता है , हमें ज़रुरत है कि घर को सुन्दर बनाये रखने के लिए अनुशासन एक सीमा में ही हो ताकि घर का प्रत्येक सदस्य उस अनुशासन में रहने का प्रयास करे |

वास्तव में यही है ”  सुन्दर घर  “ !

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