सिनेमा और समाज : 100 वर्ष का सफ़र

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‘जीत’

सौ साल पहले मुंबई का ओलंपिया थियेटर एक असाधारण घटना का साक्षी बना था। वह वर्ष था 1913 और महीना था अप्रैल का। शायद भारतीय सिनेमा के पितामह दादा साहब फाल्के को भी तब यह इल्म न रहा होगा कि वे अपनी चलती-फिरती फिल्म “राजा हरिश्चन्द्र के प्रदर्शन के द्वारा एक सुनहरा इतिहास रचने जा रहे हैं और भारतीय समाज को एक स्वप्निल सौगात देने जा रहे हैं। जब उन्होंने ‘राजा हरिश्चन्द्र’ के जरिए श्वेत-श्याम पर्दे पर अभिव्यक्ति के मूक प्रदर्शन को साकार किया, तब भी बहुतों को यह यकीन नहीं हुआ कि भारत में स्वदेशी चलचित्र के निर्माण का सूत्रपात हो चुका है। वस्तुत: हर नई शुरुआत कुछ इसी तरह के संशयपूर्ण माहौल में होती है और देखते ही देखते एक शानदार सफर में बदल जाती है। कुछ ऐसा ही भारतीय सिनेमा के साथ हुआ है। विभिन्न पड़ावों से गुजरते हुए भारतीय सिनेमा ने अपने 100 वर्षों का शानदार सफर बड़ी ही खूबसूरती से पूरा किया है।

सिनेमा के सौ वर्ष कब पूरे हुए, कुछ पता ही नहीं चला। सुनहरे सपनों के पंख लगाकर सिनेमा उड़ता रहा और देखते ही देखते भारतीय समाज का अभिन्न हिस्सा बन गया। इन सौ सालों में भारतीय सिनेमा ने भारतीय समाज पर गहरे प्रभाव भी छोड़े। सच तो यह है कि भारतीय सिनेमा को परे रखकर हम भारतीय समाज का यथेष्ट मूल्यांकन ही नहीं कर सकते।

गुजरे सौ साल भारतीय सिनेमा के लिए अमूल्य है तथा किसी धरोहर की तरह हमें इन्हें सहेज कर रखना होगा। ये सौ साल भारतीय सिनेमा के आगे के सफर के लिए प्रेरक भी हैं। अपने सौ साल के सफर में भारतीय सिनेमा ने फर्श से अर्श तक का सफर सधे कदमों से पूरा किया है। हमने मूक फिल्मों से अगला कदम बोलती फिल्मों की तरफ बढ़ाया। फिल्म निर्माण में कोलकाता स्थित मदन टॉकीज के बैनर तले ए. ईरानी ने महत्वपूर्ण पहल करते हुए पहली बोलती फिल्म “आलम आरा बनाई। इसके बाद भारतीय सिनेमा में और गति आई। हम तकनीकी और प्रौद्योगिकी के स्तर पर कहीं ज्यादा सशक्त हुए और अंतर्राष्ट्रीय सिनेमा में अपने दखल को बढ़ाया। इस्टमेन कलर, थ्रीडी, सेवेंटी एम. एम. से होते हुए डिजिटल स्क्रीनिंग और विश्व स्तर के साउंड इफेक्ट्स ने फिल्म देखने की प्रक्रिया को कहीं अधिक लुभावना बनाया है।

सौ सालों के सफर में भारतीय सिनेमा ने भारतीय समाज को कई प्रकार से प्रभावित किया। अगर यह कहा जाए कि इन सौ वर्षों में भारतीय सिनेमा ने खुद को भारतीय समाज का दर्पण सिद्ध किया है, तो गलत न होगा। यथार्थ सिनेमा और समानान्तर सिनेमा ने फंतासी से अलग हटकर जमीनी हकीकतों को पर्दे पर जगह दी और सिनेमा को उद्देश्यपूर्ण संस्पर्श दिये। हमने उद्देश्यपूर्ण सिनेमा की बुनियाद डाली और समाज को न सिर्फ सशक्त संदेश दिए, बल्कि दिशा-बोध भी कराया। व्यवस्था पर कटाक्ष भी किए और समाज के यथार्थ को भी सशक्त अभिव्यक्त दी। इस तरह भारतीय सिनेमा ने भारतीय समाज के बीच जहां मजबूत पैठ बनाई, वहीं समाज को रचनात्मक आयाम दिए, उसके नवनिर्माण में अपने अवदान को सुनिश्चित किया।

समाज से सिनेमा का हमेशा गहरा जुड़ाव रहा। इस संदर्भ में समाज के यथार्थ, उसकी समस्याओं व विभीषिकाओं को रेखांकित करने वाली कुछ फिल्मों का जिक्र आवश्यक है। विमल राय ने दो बीघा जमीन के माध्यम से देश के किसानों की दयनीय स्थिति का चित्रण किया। इस फिल्म में अभिनेता बलराज साहनी का यह संवाद जमीन चले जाने पर किसानों का सत्यानाश हो जाता है, आज भी भूमि अधिग्रहण की मार झेल रहे भारतीय किसानों की पीड़ा को सटीक ढंग से अभिव्यक्त करता है। यह पहली भारतीय फिल्म थी, जिसे कॉन फिल्म समारोह में पुरस्कार प्राप्त हुआ था। भले ही दादा साहब फाल्के ने भारतीय सिनेमा का श्रीगणेश धार्मिक फिल्मों से किया, किन्तु जल्द ही फिल्मों ने सामाजिक विषयों को अपने दायरे में ले लिया। ये फिल्में व्यावसायिक बेशक थीं किन्तु इनमें सामाजिकता के भाव प्रधान थे। इनके जरिए जहां सामाजिक समस्याओं को उभार दिया गया, वहीं समाज सुधार के रास्ते भी सुझाए गये। साथ ही सामाजिक विसंगतियों और विडंबनाओं की तरफ ध्यान खींचा गया, फिर चाहे वह राजकपूर की फिल्म ‘आवारा रही हो अथवा जेल सुधारों पर केन्द्रित वी. शांताराम की फिल्म ‘दो आंखें बारह हाथ

भारतीय सिनेमा के निर्माण और निर्देशन से जुड़े लोगों की अत्यंत सूक्ष्म दृष्टि हमेशा भारतीय समाज पर रही। यही कारण है कि भारतीय समाज का जुड़ाव भारतीय फिल्मों से बढ़ा। इन फिल्मों ने पूरे देश को एक तार में जोड़ा। त्रिलोकी जेटली ने ‘गोदान के निर्माता-निर्देशक के रूप में जिस प्रकार आर्थिक नुकसान की परवाह किए बिना मुंशी प्रेमचन्द की आत्मा को सामने रखा, वह आज भी आदर्श है। धरती के लाल और नीचा नगर के माध्यम से दर्शकों को खुली हवा का स्पर्श मिला और अपनी माटी की सीधी सुगंध, मुल्क की समस्याओं और विभीषिकाओं के बारे में लोगों की आंखें खुलीं। देवदास, बंदिनी, सुजाता और परख जैसी फिल्मों जहां युग प्रवर्तक मानी जाती हैं, वहीं महबूब खान की फिल्म “मदर इंडिया, शंभू मित्रा की जागते रहो तथा सत्यजीत रे की फिल्म पाथेर पांचाली भारतीय सिनेमा के लिए मील का पत्थर साबित हुईं। इन्होंने इसके जरिए सार्थक सिनेमा की मिसाल पेश की। रे ने भारतीय सिनेमा को अंतर्राष्ट्रीय पहचान दी। सामाजिक विषयों पर आधारित संदेशपूर्ण सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए सुनील दत्त ने अपनी फिल्म मुझे जीने दो माध्यम से बड़ी शिद्दत से न सिर्फ देश की दस्यु समस्या के प्रति ध्यान खींचा बल्कि अपराधियों के ह्दय परिवर्तन की संभावनाओं को मूर्त रूप दिया। गुरुदत्त की प्यासाकागज के फूल तथा विमल राय की साहब बीवी और गुलाम जैसी फिल्में भी जहां सामाजिक विसंगतियों के इर्द-गिर्द घूमती हैं, वहीं कथानक और अभिव्यक्ति की भी मजबूत उदाहरण हैं। ये फिल्में गंभीर सिनेमा की परिचायक थीं और समाज का बड़ा ही साफ प्रतिबिंब इन फिल्मों में दिखता था। रोटी, कपड़ा और मकान जैसी फिल्मों ने तो बड़ी शिद्दत से समाज की जमीनी हकीकतों को रुपहले पर्दे के माध्यम से आम लोगों के सामने रखा और उन्हें सोचने पर विवश किया। गुजरे दौर की फिल्म तीसरी कसम से लेकर भुवन शोम, अंकुर, अनुभव और आविष्कार तक फिल्मों का समानान्तर आन्दोलन चला। इन फिल्मों के माध्यम से दर्शकों ने समाज से जुड़ी यथार्थवादी पृष्ठभूमि पर आधारित कथावस्तु को देखा परखा और उनकी सशक्त अभिव्यक्तियों से प्रभावित भी हुए।

सिनेमा ने साहित्य को भी प्रश्रय देकर समाज में अपनी भागीदारी बढ़ाई। गोदान के बाद साहित्यिक कृतियों पर फिल्म बनाने का सिलसिला शुरू हुआ। इस प्रकार भी समाज की अभिव्यक्ति बड़े पर्दे पर बढ़ी। सिनेमा ने साहित्य से अपने अंतर्संबंधों को नए आयाम दिए। सच तो यह है कि साहित्य ने कभी फिल्मों को खालिस मनोरंजन का साधन नहीं बनने दिया और इस विधा को उद्देश्यपूर्ण आयाम दिए। यही कारण है कि साहित्य से जुड़ी कालजयी फिल्में अस्तित्व में आईं। मुंशी प्रेमचन्द की कृतियों को सत्यजीत रे ने बड़ी प्रतिबद्धता से पर्दे पर उतारा। प्रेमचन्द की कृतियों सद्गति और शतरंज के खिलाड़ी पर उन्होंने फिल्में बनाकर अमिट छाप छोड़ी। शरत् चंद्र की कृतियों पर विमल राय ने बिराज बहू और देवदास जैसी फिल्में बनाई। साहित्यिक कृतियों पर बनने वाली फिल्मों में आर. के. नारायण के उपन्यास पर गाइड, गुरुदेव रविन्द्रनाथ टैगोर की कृति पर निर्मित चार अध्याय, फणीश्वरनाथ रेणु की कृति पर शैलेन्द्र की तीसरी कसम तथा राजेन्द्र यादव के उपन्यास पर बासु चटर्जी की सारा आकाश विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। साहित्य और सिनेमा का संबंध बराबर बना हुआ है। नये दौर की सफलतम फिल्में भी साहित्यिक कृतियों पर बन रही हैं। इनमें शरद जोशी के व्यंग्य पर बनाई गई फिल्म अतिथि तुम कब आओगे तथा विकास स्वरूप की कृति क्यू एंड क्यू पर बनी स्लमडॉग मिलिनेयर विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। सार्थक सिनेमा की अभिव्यक्ति को साहित्य ने सशक्त बनाया है। साथ ही समाज को भी प्रतिबिंबित किया।

मनोरंजन के द्वारा भी फिल्मों ने समाज को कुछ देर के लिए ही सही, जिन्दगी के दर्द-ओ-गम से निजात दिलवाई है। यह भी समाज के प्रति फिल्म विधा का एक बड़ा अवदान है। फिल्में हमें अपनी रोजमर्रा की तकलीफों औ नीरस जिंदगी से उबरने का समयबद्ध मौका देती है। रुपहले पर्दे पर आदमकद नायकों, रंग से छलछलाते दृश्यों, हसीन नायिकाओं और नृत्य व संगीत आम आदमी को कुछ इस तरह से मनोरंजन की खुराक देते हैं कि वह थोड़ी देर के लिए अपने जीवन से जुड़ी तमाम पीड़ाओं व अवसादों को विस्मृत कर बैठता है। सपनों के सौदागर हमें अपने रंजोगम से उबरने का रास्ता दिखाकर अपने रंग महलों में गुम हो जाते हैं।

भारतीय सिनेमा का स्वरूप भले ही व्यावसायिक रहा, किन्तु इसमें एक पेशागत ईमानदारी बनी रही। पिछले कुछ समय से बाजारवाद के बढ़ते प्रभाव के कारण इस पेशागत ईमानदारी का ह्रास हुआ है और यह विधा आलोचनाओं की शिकार हुई। फिल्मों को बिकाऊ बनाने के चक्कर में जहां मसाला फिल्मों का निर्माण शुरू हुआ, वहीं सशक्त कथानक तो मानो विलुप्त ही हो गये। इस क्रम में सामाजिक सरोकारों की यथार्थ अभिव्यक्ति भी फिल्मों से दूर होती गई। भला समाज को ऩशा, रागिनी एमएमएस, कामसूत्र थ्रीडी या सेक्स प्रधान फिल्मों क्या मिल सकता है सिवाय मानसिक असंतुलन और गंदी सोच के। वरिष्ठ आभिनेता और निर्माता-निर्देशक मनोज कुमार का यह उद्गार महत्वपूर्ण है – आज हिन्दी फिल्मों में सशक्त कथानकों का अभाव पाया जा रहा है और फिल्में एक खास वर्ग और अप्रवासी भारतीयों को ध्यान में रखकर बनाई जा रही हैं। इस कारण लोग सिनेमाघरों से दूर हो रहे हैं क्योंकि इन फिल्मों से वे अपने आप को जोड़ नहीं पा रहे हैं। फिल्मों के नाम पर वनस्पति छाप मुस्कान, प्लास्टिक के चेहरों की भोंड़ी नुमाइश, जिस्मों की अदाएगी हो रही है, जिसके कारण सिनेमाघरों में दर्शकों की भीड़ काफी कम हो गई है। आज फिल्में मल्टीप्लेक्सों तक सिमट कर रह गई है।

अपराध, हिंसा-प्रतिहिंसा, अश्लीलता और अभद्रता को परोस कर भारतीय सिनेमा ने समाज पर नकारात्मक प्रभाव भी छोड़े हैं, जिनकी आलोचना होती रहती है। महिला को तो एक सेक्स सिंबल के तौर पर प्रयोग में लाया जाता है और कहा जाता है कि ये कहानी की मांग है और नाम व शोहरत के खातिर अभिनेत्रियां भी कुछ भी करने से शर्माती नहीं है। इनकी रोकथाम में सेंसरबोर्ड भी कोई प्रभावी भूमिका नहीं निभा सका। फिल्मों से जुड़ा यह एक ऐसा नकारात्मक पहलू है, जो गंभीर चिंता का विषय है। गिरावट हर क्षेत्र में आई है. फिर चाहे वह सिनेमा के नृत्य हों या संगीत। जिन मशहूर क्लासिकल नृत्यांगनाओं ने भारतीय सिनेमा में समृद्ध नृत्य परंपरा की बुनियाद रखी, उसकी धज्जियां आइटम सांग्स के जरिए उड़ाई जा रही है। खालिस मनोरंजन के नाम पर एक-एक आइटम सांग पर करोड़ों रुपये फूंक दिए जाते हैं और इतने फूहड़ व उत्तेजक होते हैं कि इन्हें परिवार के साथ बैठकर देखने में हर गैरतमंद शख्स को शर्म आती है। शास्त्रीय शैली की नृत्यांगनाओं का स्थान आइटम गर्ल ने ले लिया है। कमोवेश यही हाल सिने संगीत का भी है। जो सिने संगीत अपने सुरीले सफर के लिए जाना जाता था, अब उसका स्वरूप वैसा नहीं रहा। सिने संगीत अपनी लय और ताल को खो चुका है। आज का सिने संगीत लोगों को झूमता कम उनके कान ज्यादा फोड़ता है। यहां कितना मौजूं है पं. बुद्धिसेन शर्मा का यह दोहा –

नये सिनेमा को हुआ नव संगीत नसीब।

भाग रहें हों जिस तरह घोड़े बेतरतीब।।

बाजारवाद के बढ़ते प्रभाव के कारण भारतीय सिनेमा में अस्तरीयता और गिरावट बढ़ी है। पेशागत ईमानदारी भी घटी है। व्यावसायिकता की होड़ में वे सामाजिक प्रतिमान और मानक छिटक गए हैं, जिनके लिए भारतीय सिनेमा जाना जाता रहा। कहानी, विषय, नृत्य, संगीत सहित सिनेमा से जुड़े हर अवयव में स्तरहीनता दिख रही है। बड़ा सवाल यह है कि इस स्तरहीनता को कैसे रोका जाए, ताकि सिनेमा एक अच्छे समाज के निर्माण में अग्रणी भूमिका का निर्वहन कर सके।

भारतीय सिनेमा का 100 वर्ष का सफर निःसन्देह शानदार रहा है। नये दौर में इसमें कुछ भटकाव जरूर आया है, जिसे दूर कर हम आगे के सफर को और भी खुशनुमा बना सकते हैं और समाज के प्रति सिनेमा की सार्थकता को भी साबित कर सकते हैं। इसी में सिनेमा की उपादेयता भी है। सिनेमा का उद्देश्य सिर्फ मनोरंजन नहीं अपितु उद्देश्यपूर्ण स्तरीय मनोरंजन होना चाहिए और इसके लिए हमें समाज से जुड़े कथानकों को बड़े पर्दे पर सशक्त अभिव्यक्ति देनी होगी। सपनों और यथार्थ के बीच बेहतर समन्वय स्थापित कर इस सफर को सलीके से आगे बढ़ाकर हम समाज के प्रति अपने दायित्वों का भी निर्वहन कर सकते हैं।

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