सपना देखा

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इक रात मैंने सपना देखा,

क़ायनात की वादियों में वक़त दुःख ही देखा।

वो सपना कुछ रंगत भरा,

पर मैंने जो भी देखा वक़त सपना देखा।।

चाहतें इंसान की कभी कम होते न देखा,

पर मासूमों के दिल ने भी कुछ ख़्वाब देखा।

कुछ पाने की तलाश में उन्होंने,

न जाने कितने ख़्वाबों को मरते देखा।।

इंसानों को मैंने हरपल मुखौटे बदलते देखा,

सरेआम इंसानियत का क़त्ल होते देखा।

जीवन के अमूल्य रत्न पानी और पेड़ों को,

सरेराह दर्द से कराहते देखा।।

इक रात मैंने सपना देखा,

रुपयों के ख़ातिर सबकुछ बिकते देखा।

अपनी मन्नतों की ख़्वाहिश में,

लाखों माँ-बाप को सिसकते देखा।।

मानाकि मैंने ये सब सपना देखा,

पर ज़रूर कुछ सच में देखा।

ज़माने की फितरत भी है कुछ ऐसी,

पर जो भी देखा शायद हक़ीक़त में देखा।।

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I'm so keen person to learn from anyone. I write poems, short stories, articles and so other write-ups. I won many essay competitions. I've awarded many times by Pratiyogita Darpan for Hindi & English essay competitions. I won Jagran Young Editor competition and has been a MP in DJYP. I do anywork without thinking about result because i believe as a human only work is our hand recess god know that's why i try to give my 100% in any work. For contact me : [email protected] in facebook ; Jitendra pandey
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