संपादक की कलम से – बेटा बचाओ, बेटा पढ़ाओ

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ये घटना इलाहाबाद से प्रयागराज हो चुके स्मार्ट सिटी या कहूं कुंभ नगरी की स्याह तस्वीर है। 15 नवंबर, 2018 शाम के 06 बजकर 47 मिनट पर मैं सोहबतियाबाग से अलोपी चौराहे की तरफ अपनी बाइक से घर जा रहा था कि अचानक बगल से तीन बाइक सवार लौडें (ये शब्द इसलिए इस्तेमाल कर रहा हूं क्योंकि इनकी फितरत ही यही है) जा रहे होते हैं और एक लड़की किसी की बेटी अपनी कोचिंग से घर मोबाइल में बात करते हुए जा रही होती है, तभी मैं देखता हूं कि उनमें से ड्राइवर द्वारा गाड़ी हल्की धीमी की जाती है और बीच वाला शख़्स लड़की के वक्षस्थल पर हाथ फेरकर तीनों हंसते हुए बाइक तेजी से बढ़ाकर आगे निकल जाते हैं। ये वाक्या देखकर लगता है कि क्या वाकई बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ की जरूरत है इस देश में या फिर बेटा बचाओ बेटा पढ़ाओ की। ऐसे ही न जाने हर रोज़ हर जगह हो रहा है। ऐसे दृश्यों से लगता है वाकई दुनिया कैसी होती जा रही है?

मैं भी मानता हूं कि किसी एक घटना के आधार पर हम किसी समूह को निशाना नहीं बना सकते पर ये घटनाएं आज के दौर की एक आम-सी घटना हो चुकी है। आज हम सभी को बेटियां ही बचाने की क्यों जरूरत महसूस होती है उसका जवाब होता है – कन्या भ्रूण हत्या, दहेज प्रथाएं, पाश्चात्य संस्कृति का हिन्दुस्तानीकरण और लड़कियों के साथ हो रही इन जैसी तमाम घिनौनी हरकतों का डर। पर जब हकीकत में जाएंगे तो इसका अपराधी सिर्फ यही पुरुष समाज होगा क्योंकि लड़का या लड़की पैदा करना तो पुरुष के गुणसूत्रों पर आधारित होता है क्योंकि एक लड़की के गुणसूत्र तो लिंग निर्धारण के लिए जिम्मेदार होते ही नहीं।  पर दूसरा पहलू ये भी सच ही है जिससे कोई इत्तेफाक रखे या न रखे कि औरत ही औरत की दुश्मन होती है तभी तो गर्भ में पल रही बच्ची का कत्ल हो या एक लड़की की खरीद-फ़रोख्त या फिर एक बहू पर जुल्म ढ़ाने की बात सभी में एक औऱत उतनी ही गुनाहगार होती है जितना कि एक पुरुष।

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अब मुझे कोई अगर स्त्रीवादी कहे तो कहे क्योंकि अगर एक पुरुष किसी स्त्री को छेड़ करके या उसकी इज़्ज़त से सरेराह खेलकर पुरुषत्व का बख़ान करता है तो लानत है ऐसे पुरुषत्व पर। घर पर यही लड़की यदि अपने घरवालों से इस वाकये का ज़िक्र भी कर देगी तो क्या होगा आप सभी उससे अच्छी तरह से वाकिफ़ हैं। हमारे समाज की सोच न जाने कैसी हो चुकी है कि उसे सहयोग देने की बजाय उसको ही सजा दे दी जाती है। उसको ही घर की चहारदीवारी में कैद रहने को मजबूर कर दिया जाता है या जल्द ही उसकी शादी करा दी जाती है या उसी पर बेबुनियादी सवालों का ज़खीरा खड़ा कर दिया जाता है। ग़र हर परिवार अपने बेटों को ये सिखाए कि किसी की आबरू, किसी की कली या किसी के फूल पर फब्तियां कसना या अश्लील कमेंट करना या छेड़ना तो उससे पहले ये समझ लेना कि तुम हमारा नाम बर्बाद कर रहे हो तो कुछ बदलाव हो सके।

आप सभी बुद्धिजीवी होकर भी इस कटु सत्य को स्वीकार करना भी नहीं चाहते क्योंकि मानसिकता तो ये होती है कि लड़का होगा तो वंश आगे बढ़ेगा पर ज़रा सोचिएगा अगर इन लड़कों की तरह आपका बेटा किसी घर की बेटी को यूं सरेराह छेड़कर ये समझता है कि उसने बहुत बड़ा काम किया है। उसके करने का घर में तो पता ही नहीं चलता तो बर्ख़ुरदार जिस दिन इस लड़के के घर वाली बेटियों को यूं ही छेड़ा जाता है तब आख़िरकार ख़ून क्यों खौल जाता है? क्यों अपने पर वही बीतने पर गुस्सा आता है? ये कहीं न कहीं परिवार की परवरिश पर भी सवाल खड़े करती है।

हम बेटी स पहले अपने बेटों को उन संस्कारों से संस्कारित क्यों नहीं करते ताकि वो राह से गुज़र रही लड़की को अपने घर की बेटी की तरह समझे। मैं ये भी मानता हूं कि दुनिया के कोई भी माँ-बाप अपने बेटे को यही समझाते हैं कि ये सब गलत है पर कमी तो है कहीं न कहीं हमारी आपकी परवरिश में। हमें अपने बेटों को सही तरीके से परवरिश करने की जरूरत है। परवरिश ठीक वैसे ही होती है जैसे एक किसान अपनी फसल बोकर उसके परिपक्व हो जाने तक उसकी देखभाल करता है तब जाकर वो एक अच्छी और ताकतवर फसल प्राप्त करता है।

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अब जरूरत है बेटी से ज्यादा बेटों को बचाने की, उन्हें गुणात्मक शिक्षा देने की। बेटी और बेटे को एक समान मानने की। जो काम बेटा कर सकता है वही काम आज की बेटियां भी कर सकती हैं। पर फर्क है तो हमारी आपकी मानसिकता का। हमें दोनों को नैतिक शिक्षा का वो पाठ पढ़ाने की सख्त जरूरत है ताकि हम अपनी आने वाली पीढ़ी को एक अच्छा नागरिक बनाने के साथ ही एक अच्छा इंसान बनाएं ताकि लोग गर्व से कहें कि बेटा हो तो ऐसा। हमें ऐसे संस्कार रूपी बीज बोने की आवश्यकता है ताकि उन्हें ये एहसास रहे कि हम जो करेंगे वो कहीं न कहीं किसी न किसी रूप में आपको झेलना ही पड़ता है क्योंकि वक्त एक-सा नहीं होता है। ये वो समय का चक्र है जिसकी सुइयां एक ही बार नहीं समय बताती बल्कि समय चक्र की सुइयां तो सदैव चलायमान होती है। अब फैसला आपके हाथों में है कि आपको क्या करने की आवश्यकता है।

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