संपादक की कलम से – अभी तो ये ट्रेलर है!

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लोकतंत्र अर्थात् जनता का जनता पर जनता द्वारा शासन। देश की राष्ट्रीय राजनीतिक दल का देश के तीन राज्यों में मुंह के बल गिरना वाकई उसके लिए एक बहुत बड़ा झटका है। जी हाँ, हम बात कर रहे हैं भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) की। एक हिंदी में कहावत है कि आदमी को उतना ही उड़ना चाहिेए, जहां से जमीन दिखायी दे क्योंकि अंत में उतरना जमीन पर ही पड़ता है।

बीजेपी की हार ये साबित करती है कि जनता को अब जुमलेबाजी नहीं बदलाव चाहिए। ऐसा बदलाव जिसमें वो चैन की सांस ले सके और उसे रोजगार प्राप्त हो सके। तेलंगाना और मिजोरम की जनता को तो अपने क्षेत्र की ही पार्टियों पर गहरा विश्वास था, जो विधानसभा चुनाव में दिखा। राजस्थान और छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की जीत महज़ बीजेपी की बढ़ती तानाशाही का ही परिणाम है। फिर राजस्थान के पिछले कई सालों का ये आलम ही है कि वहां की जनता हर 5 साल में अपनी सरकार को बदल देती है ताकि किसी को ये गुमान न रहे कि वह उसका गढ़ है। काश ! यही फितरत देश के अन्य राज्यों की जनता में भी होती। देश का दिल यानी वह ह्दय जहां भारत की जनता का दिल धड़कता है – मध्यप्रदेश। बीजेपी के गढ़ माने जाने वाले इस प्रदेश की जनता अपनी सरकार से इतना ऊब चुकी थी कि बदलाव होना लाजिमी था हालांकि पूर्ण बहुमत की सरकार तो कांग्रेस भी नहीं बना सकी। बीजेपी की सरकार बनने के बाद से उससे न तो कर्मचारी औप न ही युवा वर्ग खुश है। रोज़गार के नाम पर तो युवाओं को इस कदर छला गया, जिसका दर्द शायद उत्तर प्रदेश के युवा बेहतर ढ़ंग से जानते हैं, जहां नौकरी पाकर भी युवा नियुक्ति के लिए बेबस हैं। भर्तियों में चल रही घोटालेबाजी की तो पूछिए ही मत।

ये तो आगामी लोकसभा चुनाव 2019 के पहले का सिर्फ ट्रेलर है पूरी पिक्चर तो अभी बाकी ही है। पर ये बीजेपी के लिए चेत जाने और ख़तरे की घंटी है कि अब मोदी मैजिक भी फीका पड़ने लगा है। सोशल मीडिया में भी मीम चल रहे हैं कि पप्पू पास हो गया पर पप्पू भी तभी पास होगा जब वे जनता के लिए कुछ करेंगे। अब हम 21वीं सदी में चल रहे हैं, जहां जनता जागरूक हो चुकी है कि उसके लिए कौन-सी पार्टी काम करेगी और कौन खाली जुमलेबाजी? अब तो बाकी लड़ाई मुख्यमंत्री पद देने की है तो वे तो पार्टी अध्यक्ष ही निर्णय करेगी हालांकि मध्यप्रदेश में ज्योतिराज सिंधिया बनाम कमलनाथ और राजस्थान में सचिन पायलट बनाम अशोक गहलात के नामों पर चर्चा जारी है। कुल मिलाकर यह चुनाव युवा बनाम अनुभव के बीच का है।

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कांग्रेस को इन राज्यों में मिली जीत का जश्न तो मनाना चाहिए पर मगरूर नहीं होना चाहिए क्योेंकि जनता को अपनी सरकार से उनके लिए कुछ कर गुजरने की आस होती है। जब वही सरकार उसकी उम्मीदों पर ख़रा नहीं उतरती तो वह उस पार्टी को अर्श से फर्श पर ला देती है। यही तो लोकतंत्र की सबसे बड़ी खूबियों में से एक ख़ूबी है। जब दिखावटी विकास की परंपरा चलने लग जाती है तो जनता द्वारा उसके एक वोट की कीमत चुनाव में उस पार्टी को भी समझ आ जाती है।

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