शिक्षा की बदहाली : पीढ़ी का विनाश

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Education Scarcity

शिक्षा एक ऐसा सशक्त एवं प्रभावी माध्यम है, जिसके द्वारा व्यक्ति का विकास होता है, उसका उद्धार होता है, उसका सांस्कृतिक नवीनीकरण होता है, उसकी आर्थिक प्रगति होती है तथा स्त्री-पुरुषों को समाज की विभिन्न आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए प्रशिक्षण मिलता है। शिक्षा प्राप्त व्यक्ति आधुनिक कालीन वैग्यानिक, तकनीकी एवं परमाणविक समाज के उपयुक्त धर्मनिरपेक्ष एवं जनतांत्रिक दृष्टि का विकास करता है। दुर्भाग्य की बात है कि जीवन की इस परम आवश्यकता से हमारे अनेक नौनिहाल वंचित रह जाते हैं और हमारा समाज इन विकासमान बालकों की प्रतिभा का लाभ नहीं उठा पाता है। विडम्बना यह है कि ये कलियाँ मुस्कुराने का भी अवसर प्राप्त नहीं कर पाती हैं। एक शिक्षाविद् का यह कथन मनन करने योग्य है कि किसी भी देश का निर्माण उसकी कक्षाओं में होता है यह सही है कि किसी भी देश की प्रगति एवं उसके चारित्रिक विकास का स्तर उसके नागरिक के व्यक्तित्व पर निर्भर करता है और नागरिकों के निर्माण का स्वरूप सीधे उनके शैक्षिक पर्यावरण एवं उसकी शिक्षा-नीति से जुड़ा रहता है। तभी तो कहते हैं –

न चौरहार्यं न च राजहार्यं

न भातृभाज्यं न च भारकारी।

व्यये कृते वर्धते एवं नित्यं,

विद्या धनं सर्व धनं प्रधानं।।

यह निर्विवाद सत्य है कि शिक्षा के बिना मानव का यथेष्ठ विकास संभव नहीं है। शिक्षा एक सोद्देश्य तथा सविचार की ऐसी उत्तम प्रक्रिया है, जिसका उद्देश्य ज्ञान को विकसित तथा परिमार्जित कर उपयोगी बनाना है। मानव ज्ञान के विकास के लिए शिक्षा अत्यावश्यक है और तभी जीवन का विकास संभव है। विकास की पहली सीढ़ी शिक्षा है परन्तु परिस्थितियों के चक्रवात में भारत ऐसा फंसा कि आज यहाँ अशिक्षा, अज्ञानता, रूढ़िवादी सोच और मानसिकता का साम्राज्य व्याप्त है। विश्व के निरक्षरों का एक बड़ा प्रतिशत भारत में विद्यमान है। साक्षरता को विकास एवं मानव-जीवन की गुणवत्ता का सूचक माना जाता है। भारत के साक्षरता दर में पिछले दशकों से सतत् वृद्धि हुई है। 1991 में जहाँ भारत की साक्षरता दर 18.53 थी, वहीं 2001 में बढ़कर 64.8% तदोपरांत 2011 की जनगणना में बढ़कर (9.4 %) 74.04% हो गयी है।

मैं शिक्षा के विकास की बात को उद्घाटित नहीं करूंगा क्योंकि उससे सभी रुबरू होगें। मेरा सवाल ये है कि वर्तमान शिक्षा व्यवस्था में ऐसी क्या खामियाँ समावेशित हो चुकी हैं, जिससे बदहाली और मूल्यपरकता नगण्य जैसे तत्व उभर आए हैं। सर्वशिक्षा अभियान में लड़कियों और कमजोर वर्ग के बच्चों पर विशेष ध्यान दिया जाता है परन्तु इसमें बढ़ती शिकायतों और गड़बड़ियों के चलते इस सर्वगड़बड़ी अभियान में माँ नामक संस्था द्वारा मिड-डे मील योजना हेतु सौंपा गया है। इसके बावजूद खाने में मरा हुआ साँप पाया जाता है। शिक्षा की बदहाली का आलम यह है कि बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में खुलेआम बोर्ड परीक्षाओं में नकल होती और करवायी जाती है। शिक्षकों को तो ये तक मालूम नहीं है कि उनके देश का प्रधानमंत्री कौन है? आलम तो यहाँ तक है कि एक छात्रा राज्य में अव्वल आ जाती है और उसे पॉलिटिकल साइंस का सही उच्चारण भी नहीं आता। यहां पर इसके लिए जिम्मेदार कौन है?  सीबीएसई बोर्ड के ऊंचे रिजल्ट की होड़ में अंकों का मनमाने ढ़ंग से आवंटन या फिर शिक्षकों की भर्तियों में होने वाला भ्रष्टाचार। आज हालात ऐसे हैं कि रिजल्ट का प्रतिशत उच्च होने से उनकी पहचान विशिष्ट होने लगी है और मेहनत से अगर कोई कम प्रतिशत पाया तो उसे नौकरी तक नहीं मिल रही। ऐसे नकल करके उच्च प्रतिशत प्राप्त करके शिक्षक बनने वाले क्या अच्छी शिक्षा दे पाएंगे?  क्या ऐसे भारत के बच्चे देश का नाम रोशन करेंगे या विश्व गुरू बनवाएंगे? क्या ऐसे हमारे देश के नौनिहाल देश के कल के भविष्य बनेंगे? ये सभी प्रश्न बहुत ही विचारणीय है, जिस पर सरकार को ध्यान केन्दित करना ही होगा।

2016 में एक बहुप्रसिद्धि फिल्म आयी  – दंगल. उसको सबने देखा। हरियाणा जहां की भूमि से हमारे प्रधानमंत्री ने “बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ” योजना का उद्घोष किया परन्तु ये फिल्म भी न तो हरियाणा के लोगों की सोच बदल पाई न ही मानसिकता कि “म्हारी छोरियाँ किसी छोरे से कम हे के” तभी तो आजादी के 6 दशक यानी 70 वर्षों के बाद भी रेवाड़ी जिले की 85 लड़कियों को गांव में 12वीं कक्षा खुलवाने के लिए धरने पर बैठना पड़ा। यह देश व समाज के शिक्षा व्यवस्था के लिए एक करारा तमाचा है। सरकार योजनाएं तो ला देती है परन्तु उन योजनाओं की प्रगति व संचालन पर उसका कोई खास ध्यान नहीं रहता। अगर शिक्षा के क्षेत्र में यूं ही अनदेखी और लापरवाही होती रही तो समाज का युवा वर्ग बलात्कार, चोरी, छिनैती जैसे अपराध के दलदल में इस कदर घुसता चला जाएगा कि जहां से उनको निकालना बहुत ही कठिन काम हो जाएगा।

आख़िर क्या वज़ह है कि लोग अगर संपन्न हैं तो अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों की बजाय प्राइवेट स्कूलों में भेजते हैं। कोई भी नेता. मंत्री, सेलिब्रेटी का बेटा क्यों नहीं सरकारी स्कूलों में पढ़ता? आज अगर शिक्षा व्यवस्था बेहतर होती तो क्या कश्मीर में छात्र-छात्राएं पत्थरबाज होते, क्या आज उच्च शिक्षा प्राप्त करके लोग सफाई कर्मचारी का फार्म भर रहे होते, क्या आज बेरोजगारी इतनी होती। सरकार को गंभीरता से सोचना होगा अन्यथा हालात बद से बदतर होते चले जाएंगे क्योंकि ये सभी जानते हैं कि शिक्षा वो प्रकाश पुंज है जिसके माध्यम से तमाम बुराइयों, अंधविश्वासों, रुढ़ियों, और मतभेदों को आसानी से दूर किया जा सकता है और तभी नयी चेतना का विकास होगा, महिला सशक्तिकरण होगा अन्यथा आए दिन आज के अख़बारों की तरह हर तरफ इंसानियत को शर्मसार करने वाली घटनाओं से पूरा अख़बार भरा होगा।

 

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I'm so keen person to learn from anyone. I write poems, short stories, articles and so other write-ups. I won many essay competitions. I've awarded many times by Pratiyogita Darpan for Hindi & English essay competitions. I won Jagran Young Editor competition and has been a MP in DJYP. I do anywork without thinking about result because i believe as a human only work is our hand recess god know that's why i try to give my 100% in any work. For contact me : [email protected] in facebook ; Jitendra pandey
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