शांत चांदनी रात में

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  •  रमेश चंद्र शुक्ल 

शांत चांदनी रात में ,
दूर नील गगन में ..
आता है एक चेहरा ..
जिसका नहीं है कोइ रूप..
कभी कभी बादलों की रंगत से ,
बीच में निकलती है एक चमक ..
बनता है एक चित्र .. कभी शांत..
खामोश और कभी हंसता हुआ ..
चांदनी रात का अमृत ..
बिखर जाता है ओश बनकर ..
मिलता है नया जीवन ..
कोमल पत्तियों की खामोशी ..
समेट लेती है ..आगोश में ..
खिल उठता है ..चन्द्रपुष्प ..
होठों पे मद्धिम सी एक मुस्कान..
और काली आंखो की वह चमक..
कह जाती है बहुत कुछ…!!

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