शर्मसार होती इंसानियत…

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क्या लिखूं? मैं इसलिए नहीं लिख रहा क्योंकि ऐसे लेख लिख करके सबकी आंखों का आकर्षण बन सकूँ। बस एक इंसान के तौर पर मैं क्या सोचता हूं, उन भावनाओं को चन्द शब्दों के माध्यम से आप सभी के समक्ष रख रहा हूं। प्यारी और मासूम आशिफ़ा, बेटा आपने जो इंसान की वीभत्सता, क्रूरता, कसाईपन, निर्दयता, निर्ममता का भयावह मंजर देखा है, उसकी कल्पना भी कर पाना शायद मेरे तो क्या किसी भी इंसान के बस की बात नहीं। ताज्ज़ुब होता है कि ऐसे इंसान इसी समाज में हैं और वो हमारे बीच में ही रहता है, नक़ाब चढ़ाए। अपनी बच्ची नहीं है क्या ये वज़ह थी या वो मुस्लिम थी या वो सेक्स सिंबल थी या उसके कपड़े ऐसे थे या हवस की भूख़ दिमाग में बस चुकी थी? न जाने ऐसे कितने अनसुलझे और अनुत्तरीय सवाल होते हैं, जब भी बलात्कार किए जाते हैं। निर्भया कभी पूजा कभी आशिफ़ा ये नाम की लिस्ट तो ख़त्म होने का नाम ही नहीं ले रही है। मौज़ूदा वक़्त में हर अख़बार और न्यूज़ चैनल्स में ऐसी ख़बरों की भरमार-सी लग चुकी है। हमसे बड़े-बड़े विकास की बात, देश को विश्व-गुरू बनाने की बात, बुलेट ट्रेन चलाने की बात करने वाली सरकार क्या इंसानियत या बच्चियों की चीख़ों से ज्यादा ये सारी चीज़ें महत्वपूर्ण हैं?  क्या विकास इसे ही कहते हैं जहां नौनिहाल भूख़ से तड़पते हों और उनकी भूख़ को शान्त करने की बजाए वो ख़ुद किसी की वहशीपन और हवस की भूख़ का निवाला बन जाए।

21वीं सदी में जी रहे हैं हम जहां सबकुछ खुला है तो हम उसी पुराने कानून के सहारे इन जाहिलों और मानसिक विकृत वहशी दरिन्दों को सजा दे पाने में सक्षम हैं?  क्या बौद्धिक वर्ग में ज़रा-सी भी कल्पनाशीलता नहीं बची? इंसानियत तो न जाने कब की मर चुकी है तभी तो राह चलते लड़की बलात्कार हो जाता है, पवित्र मंदिर के आंगन में पिछले महीने ही पूजी गई कन्या को ऐसा दर्द दिया जाता है कि इंसान होने पर शर्म महसूस होती है, सड़क पर कोई छेड़े तो वीडियो बनाए जाते है न कि उनको सजा दिलायी जाती है। मासूमियत का गला घोंट दिया जाता है और हम सब इन्हीं नेताओं की तरह कभी धर्म की कभी जाति की कभी अहम की कभी अपने-पराए की कभी अमीर-गरीब की जैसे तमाम बेवज़ह के मुद्दों में उलझे रहते हैं। हमारे लिए उसकी भावनाएं, मासूमियत, वेदना और मानवीय संवेदनाओं से कोई वास्ता नहीं रहता। क्या फेसबुक, ट्विटर और सोशल मीडिया में अपनी भावनाओं का प्रदर्शन कर देना या सड़क पर निकलकर कैंडल मार्च कर देने से हमारा काम ख़त्म हो जाता है?

मानता हूं यदि हमें किसी को जीवन देने का अधिकार नहीं तो उसे मौत की सजा देने का भी कोई अधिकार नहीं पर क्या एक इंसान होने के नाते ऐसी क्रूरता और वीभत्सता को देखते रहकर उन दरिन्दों का हौसला बढ़ाते रहना है, बेटी के जन्म के लिए सोचते रहना है, उसकी हिफ़ाजत के डर से उसे जन्म ही नहीं लेने देना है या फिर हम सबमें इतनी हिम्मत ही नहीं कि हम उन्हें वो माहौल दे सके जहां वो भी अपनी जिन्दगी को ख़ुशी से जी सके, अपने सपनों को साकार कर सके। इस जहां में उड़ सके। हमें समाज में ऐसे नारों की जरूरत क्यों पड़ती है कि बेटी बचाना है, हम क्यों ये नहीं सोचते कि बेटों को उनकी हद में रहना सिखाना है। कभी राम मन्दिर कभी बाबरी कभी धर्म कभी आस्था कभी भारत बंद तो कभी आरक्षण आख़िर क्यों हम इतने आधुनिक होकर भी इन नेताओं की चालों में उलझकर मूल मुद्दों से भटक जाते हैं?

हमें सऊदी अरब जैसे कानून की जरूरत है जिससे ऐसे कुकृत्य करना तो दूर सोचने मात्र से ही रूह कांप जाए। भारत जैसे देश में कानून तो बहुत हैं और बना भी दिए जाएंगे पर क्या मात्र कठोर कानून बना देने से उद्देश्य की पूर्ति हो जाएगी, नहीं, इसके साथ ही हमें पुलिस जांच और न्याय प्रक्रिया को दुरुस्त करने की भी सख़्त आवश्यकता है। उन्नाव हो या कठुआ में यही तो हुआ न। ऐसे दुष्कर्म के मामलों की जांच में भी तो एक नारी का फिर से बलात्कार ही तो किया जाता है, उसका दो अंगुली परीक्षण करके। केवल कानून कठोर हो जाने से ये नहीं रुकेगा, जरूरी है कि हमारे नीति-नियंताओं को इस ओर भी ध्यान देने की जरूरत है कि इनका दुरूपयोग भी न होने पाए। हम सभी जानते हैं इसी देश में कानून बनते हैं पर उनको नियंत्रित पुलिस द्वारा ही कर लिया जाता है।

जरूरत है कठोर नियम के साथ ही ऐसे बदलाव की जिसमें नियमों का नाजायज़ फ़ायदा भी कोई न उठा पाए साथ ही हमें ये बदलाव अपने घर-परिवार के बच्चों में ऐसी नैतिक शिक्षा देने की ताकि हमारे घर का चिराग एक वहशी दरिन्दा बनने की बजाए मानवीय संवेदनाओं को समझने वाला व्यक्तित्व बनें। हमारे द्वारा समाज में ऐसा माहौल बनाने की जहां मासूम या लड़की को सुरक्षित महसूस हो, जहां लड़की और लड़के में भेदभाव न किया जाए औऱ न ही किसी को ज्यादा और कम समझा जाए वर्ना हम सब मोमबत्ती जलाकर, न्यूज चैनल्स औऱ सरकार पर आरोप-प्रत्यारोप लगाकर केवल चन्द दिन तक उसकी आत्मा को शांति प्रदान कर पाएंगे। हमें नेताओं की राजनीति को समझना होगा। हमें महत्वपूर्ण मुद्दों पर बात करनी होगी न कि धर्म के नाम पर या आऱक्षण के नाम पर या किसी भी ऐसे मुद्दे पर आपस में उलझना है जो हमें महत्वपूर्ण मुद्दों से भटकाने के लिए फैलाए जाते हैं तभी हम उन सभी मासूमों और एक नारी को न्याय दिला सकते हैं। एक इंसान बन सकते हैं वर्ना महज़ हाड़-मांस के पुतले के अलावा हमारा कोई वज़ूद नहीं रह जाएगा।

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