विद्यार्थी और विद्यालय -आज फिर अजनबी हुए

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आज हम फिर अजनबी हुए मगर इस बार हम एक दूसरे को जानते हुए भी अजनबी हुए……
हर रोज़ उस ओर से निकलते हुए तुम्हारा दीदार तो जरूर हो जाता है,
लेकिन अब सिर्फ तुम्हारा दीदार ही कर दिल आगे की ओर बढ़ जाता है
लेकिन हां ! आज बस तुम्हारा दीदार ही , पल-पल भर की यादों के साथ,ढ़ेर सारी खुशियों का झोंका लेकर आता है मगर फिर चुपके से आंखों में आंसुओं की बूंदें भी छोड़ जाता है।
सोचता हूं, कभी रुक कर थोडा़ तुमसे मैं बात करुं  ,
लेकिन ! सिर्फ सोचता ही हूं!और अगले दिन पर टाल कर फिर आगे बढ़ जाता हूं।
क्या तुम्हें याद है पहले दिन की बात है,पापा के साथ आया था, उन्होंने मुझे तुम्हारे गेट पर ही छोड़ा था, मैं थोड़ा डरा, थोड़ा सहमा था क्योंकि मैं तुमसे तब भी अजनबी था।
लेकिन फिर तुममें ही खेलता था, तुममें ही सब सीखता था, सुबह से लेकर शाम तक तुम्हारे पास ही तो रहता था, क्योंकि अब कोई नहीं अजनबी था।
फिर समय यूं ही बीत गया,मैं भी शायद था अब बहुत कुछ सीख गया,
 मुझे तुम्हारा साथ अब यहीं बस छोड़ना था,
साथ ही कुछ यादें तुम्हारे पास तो कुछ साथ संजोए हुए भी ले जाना  था।
अब मैं, मैं नहीं था,अब मैं,हम हो गया था,
क्योंकि अब तुमसे ही बहुत कुछ सीख गया था।
याद है, वो आखिरी दिन, जिस दिन तुमसे अब दूर ही होना था,
दिल थोड़ा चिड़चिड़ा और थोड़ा बेगाना भी हो गया था।
निकल रहा था जिस दिन, बहुत सारी यादें साथ रखकर, थोड़ा रुक कर-थोड़ा ठहरकर चारों ओर फिर एक बार देखा था और पहले दिन से अंतिम दिन तक का सफर तेजी से आंखों के सामने बटोरा था।
यारों के साथ हम भी निकल रहे थे,सब अपनी -अपनी बातें कर रहे थे। सबके चेहरों पर अपनी अपनी बात थी, लेकिन अभी भी मैं वो बच्चा था, जिसका दिल तुमको छोड़कर जाने के लिए शायद अभी कच्चा था।
सोच रहा था आया तो अकेला था,जा रहा भीड़ के साथ हूं।
अब जाऊंगा कहां ये भी पता नहीं, मिलूंगा कब इसका भी कुछ पता नहीं।
सोचता हूं कभी इस भीड़ में तुमको भी नजर आऊं, शायद तुमको भी कभी मैं याद आऊं।
देखता तो तुमको रोज़ हूं, लेकिन शायद एक बार फिर मैं अजनबी हूं।

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