विचित्र राजनीति

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  • अर्पित चंसोरिया 

भारतीय राजनीति भी विचित्र है। जिस मकसद को लेकर चलते हैं हमारे राजनीतिक दल और राजनेता, उसका कई बार बिलकुल उलटा हो जाता है। सो, नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बन जाने के बाद हिंदुत्व के सिपाहियों ने तय किया था कि उनकी विचारधारा के फलने-फूलने का समय आ गया है, लेकिन उसका उलटा होता दिखने लगा है। यानी ऐसा लगने लगा है अब कि हिंदुत्व विचारधारा ही बन गई है हिंदू वोट को संगठित होने की सबसे बड़ी दुश्मन। इसका उदाहरण पहली बार देखने को मिला पिछले सप्ताह, जब दलित गुटों ने उत्तर भारत के कई शहरों में जुलूस निकाले और तोड़फोड़ की।

कहने को उनका गुस्सा था सिर्फ सर्वोच्च न्यायालय के उस फैसले के खिलाफ, जिसने उनकी सुरक्षा के लिए बनाए गए कानून को कमजोर किया है। लेकिन क्या वास्तव में कारण सिर्फ यही था? कारण सिर्फ यही होता तो मोदी सरकार का क्यों इतना विरोध देखने को मिला? इतना विरोध कि मोदी के वरिष्ठ मंत्रियों ने टीवी पर आकर कहा कि दलितों को गुमराह करने का काम विपक्ष के नेता कर रहे हैं।

ऐसा बेशक हो भी सकता है, लेकिन दलितों के इस नए आंदोलन का विश्लेषण निष्पक्ष अंदाज से किया जाए, तो दिखने यह लगता है दलितों का गुस्सा काफी पहले से शुरू हुआ है। मेरी राय में शुरुआत गुजरात के ऊना शहर में तब हुई जब दलित युवकों को चलती गाड़ी के पीछे बांध कर गोरक्षकों ने लोहे के सरियों से उनको सरेआम पीटा, सिर्फ इसलिए कि वे एक मृत गाय की खाल उतारते पाए गए थे।

इस घटना के बाद प्रधानमंत्री पहली बार बोले थे गोरक्षकों के खिलाफ, लेकिन तब तक इन गोरक्षकों की हिंसक टोलियां जगह-जगह घूम रही थीं देश भर में गोमाता की सुरक्षा के नाम पर मुसलमानों को मारने। माथे पर तिलक थे इनके, कंधों के भगवा पटके और आंखों में खून उतरा हुआ था। इतना भय था इन गोरक्षक हत्यारों का कि किसानों ने गायों को पालना बंद कर दिया और गोहत्या तकरीबन बंद हो गई है। सो, बूढ़ी गाएं अब सड़कों पर छोड़ दी जाती हैं अपने भरोसे जीने को।

गोरक्षकों का प्रभाव पड़ा है उन सारे कारोबारों पर, जो गायों से जुड़े हैं। गोरक्षकों की भाषा से स्पष्ट था कि उनका मकसद था मुसलमानों को ठिकाने लगाना, लेकिन अपने ये हिंदुत्ववादी सिपाही शायद भूल गए थे कि मुसलमानों के अलावा इन कारोबारों में दलित और अन्य पिछड़ी जाति के हिंदू भी काम करते हैं। सो, जब दुकानें और कारखाने बंद होने लगे गौमाता की रक्षा के नाम पर, तो हिंदुओं के रोजगार पर भी असर पड़ा और वह भी ऐसे दौर में जब बेरोजगारी का हाल यह है कि रेल मंत्रालय ने जब पिछले दिनों नब्बे हजार नौकरियों की घोषणा की, इन नौकरियों को लेने सामने आए दो करोड़ से ज्यादा नौजवान।

बेरोजगारी का यह हाल है कि प्रधानमंत्री को खुद कहना पड़ा कि उनके दौर में मुद्रा योजना के तहत लाखों नौजवानों ने लोन लेकर छोटे-मोटे कारोबार शुरू किए हैं। जो पकौड़े बेचने की दुकान खोलते हैं, वे भी आखिर नौकरी कर रहे हैं और एक दो और लोगों को भी नौकरी दे रहे हैं। हकीकत यह है कि पकौड़े वही नौजवान बेचने पर मजबूर हैं, जिनको नौकरी नहीं मिलती है। मोदी के दौर में निजी क्षेत्र में ऐसी मंदी छाई रही है कि बड़े-बड़े कारखानों और कंपनियों का इतना बुरा हाल है कि नई नौकरियां पैदा करने के लायक ही नहीं हैं। कभी वह दौर था जब सरकारें ही नौकरियां देने की क्षमता रखती थीं, लेकिन धीरे-धीरे वह दौर समाप्त हो गया है, सो नई नौकरियां पैदा होती हैं ज्यादातर अब निजी क्षेत्र में। निजी क्षेत्र में मंदी के बादल मंडराने लगे थे सोनिया-मनमोहन सरकार के अंतिम दिनों में कुछ गलत आर्थिक फैसलों के कारण।

सो, जब मोदी राष्ट्रीय स्तर की राजनीति में आए यह कहते हुए कि वे ऐसा परिवर्तन और विकास लाकर दिखाएंगे, जिससे भारत के लोग गरीबी की चंगुल से निकल कर संपन्नता की ओर बढ़ सकेंगे, तो नौजवानों को उनकी बातें बहुत अच्छी लगीं। लेकिन विकास और परिवर्तन के बदले मोदी के दौर में ज्यादा अहमियत दी गई है हिंदुत्व के एजेंडे को। उत्तर प्रदेश में अगर एक ऐसे व्यक्ति को मुख्यमंत्री बनाया गया है, जो भगवा पहने है और जिसका राजनीतिक सफर शुरू हुआ था रामजन्मभूमि आंदोलन से, तो मध्यप्रदेश में भी हिंदुत्व का असर दिखने लगा है सरकारी कामकाज में।

पिछले हफ्ते मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री ने पांच साधु-संतों को राज्यमंत्री का दर्जा दिया है। ऐसा क्यों? क्या हिंदुओं के धर्मगुरुओं को राजनीति में इस तरह लाया जाएगा तो मौलवियों को भी लाना नहीं पड़ेगा? उधर दिल्ली में मोदी के मंत्री भी उलटी-सीधी बातें करते फिरते रहे हैं मुसलमानों को लेकर, बिना यह देखे कि हिंदुत्व के नाम पर नहीं जीत कर आए थे 2014 में।

जीते थे परिवर्तन और विकास के नाम पर। सबका साथ सबका विकास वाले नारे के बल पर। उस चुनाव में इन नारों ने हिंदुओं के बीच जातिवाद की दरारों को मिटा दिया था। उम्मीद मोदी से यही करके दलित और अन्य पिछड़ी जाति के हिंदुओं ने वोट डाला कि राष्ट्रीय स्वयं संघ के एजेंडे को ताक पर रख कर वे विकास के रास्ते पर लेकर चलेंगे देश को।

भारत में मुसलिम वोट बैंक जरूर है, लेकिन हिंदू वोट बैंक तभी बनता है जब जातिवाद की दरारें मिट जाती हैं। अब स्थिति यह है गोरक्षकों की गतिविधियों और गलत कामों की वजह से कि वे दरारें लौट कर आ गई हैं और इसका परिणाम हम देख चुके हैं गोरखपुर और फूलपुर में।

अगर मोदी हारते हैं 2019 में तो हारेंगे हिंदुत्व के कारण। पिछले हफ्ते मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री ने पांच साधु-संतों को राज्यमंत्री का दर्जा दिया है। ऐसा क्यों? क्या हिंदुओं के धर्मगुरुओं को राजनीति में इस तरह लाया जाएगा तो मौलवियों को भी लाना नहीं पड़ेगा? मुद्दा वर्तमान हालातों में अतिविचारणीय है।

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