लिक्खूँगा !
  • डॉ कैलाश मिश्र जी

 

तेरे सब करतब लिक्खूँगा
एक एक कर सब लिक्खूँगा

हो तो हो ऐतराज़ किसी को
तुझको अपना रब लिक्खूँगा

मेरे पास बहुत किस्से हैं
जब लिक्खूँगा तब लिक्खूँगा

जाति धर्म कुल गोत्र कुछ नहीं
इश्क़ मेरा मज़हब लिक्खूँगा

यारों का है शहर बनारस
इसके लिए ग़ज़ब लिक्खूँगा

मेरा मुदर्रिस यार है मेरा
उसको मैं मक़तब लिक्खूँगा

फुरसत ज़रा मिले तो बैठूं
जीने के कुछ ढब लिक्खूँगा

चला चली की इस बेला में
सबको बस गुडलक लिक्खूँगा ।।

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