लगन..

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  • अंकिता मिश्रा 

मंजिलें बांहें फैला रही,
आंखे तरासती रही
धूमिल सी राहें मेरी,
वक्त को कोसती रही,
वक्त वो हवा का झोका है,
जो किसी का इंतजार नहीं करता,
मंजिलें तो खुद बनानी पड़ती है,
बस हौसला अपना होता है,
वक्त भाग्य की वो घड़ी है,
जो हमारे हाथों की छड़ी है,
बस कुछ करने का ज़ज्बा हो अगर,
राहें आसान सी हो जाती है,
फिर वक्त को कौन रोके,
मंजिलें खुद-ब-खुद बन जाती हैं।।

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Founding Editor & Promoter - The Social Rush - दा सोशल रश Chief Publisher & Founder - Express POINT
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