रेत के तले दबी लाशें

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लाशें
  • सुनील यादव   “नील ” 

 

रेत के तले दबी लाशें अब भी साँसे ले रही होंगी वो दुनिया के से दूर अपने शहर में खुश होंगी उनको किसी से

मारे जाने का डर नही होगा और न ही किसी के मोहब्बत में हार जाने का गम होगा सपने में उनके उड़ान

होगी वो किसी आसमान में उड़ने की इच्छा नही रखती होंगी न ही अपने प्रेमी या प्रेमिका को याद करके तारे

गिनती होंगी वो तो बस अपने मिट्टी के बने ताबूतों में से छोटा सा छिद्र करेंगे और चुपके से दुनिया को देख

लेंगी उनको दुनिया पूरी उजड़ी उजड़ी लगेगी जब तक वो मन मे अपने कुछ विचार करेंगे उजड़ी बस्ती में

जाने का तब तक उनको एहसास हो गया होगा उनको लगेगा कि वो दुनिया से बेईमानी कर रही है उनका तो

हक मर चुका है इस दुनिया को देखने का उनको तो कुछ गज जमीन उनके शरीर की नाप की दे दी गयी है

और उस जमीन पर छत ढाल दिया है कई लोगो ने मिलकर ! 

 

तू जब हंसती है

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