राहुल गांधी ने आख़िरकार ख़ुद को “पप्पू” मान लिया।

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कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने अब जाकर वो मान ही लिया, जो आज तक जोक्स और विपक्षी पार्टी द्वारा महज उनका मजाक उड़ाने के लिए पप्पू शब्द का इस्तेमाल किया जाता रहा है। आपको बता दें कि हाल ही में संसद में अपने उद्बोधन के दौरान कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी कहते हैं कि यदि आप उन्हें पप्पू कहते हैं तो मैं क्रोधित नहीं होता। पर जनाब पप्पू मानने का अर्थ हो जाता है कि आप राजनीति में अभी बच्चे ही हैं। पप्पू का अर्थ होता है – मूर्ख। जिसका पूरे सदन ने ठहाके लगाकर मजा लिया। हमारे देश को किसी पप्पू की जरूरत नहीं है बल्कि ऐसे खेवनहार की आवश्यकता है जो बीच मझधार में फंसी जनता के कष्ट को समझकर उन्हें दूर करने का हर संभव प्रयास करे। जैसे कि कानपुर देहात के नए एसपी की चार्ज लेने की कहानी आप सभी तो जानते ही हैं।

देश की जनता को देश चलाने के लिए न तो किसी पप्पू की जरूरत है न ही झूठे वादे और जुमलेबाजी् करने वाले किसी नेता की। देश की जनता को तो वो मसीहा चाहिए, जो देश की जनता के दर्द को समझे और युवाओं की बढ़ती बेरोजगारी और भूख से तड़पते देश के कल को रोटी देने वाला हो। पार्टी चाहे जिसकी हो, सरकार चाहे जिसकी बने। गरीब जनता को तो कोर्ट के उस कटु सत्य तारीख़ पे तारीख़ की ही तर्ज़ पर मिलती है तो बस दो मिनट की हमदर्दी पे हमदर्दी। ऐसे हमदर्द की उन्हें कोई जरूरत नहीं, जो बातें तो गरीबों की करें पर शोषण भी उन्हीं का हो। उज्जवला योजना का गांव तक पहुंचने का सबसे बड़ा कारण उससे गैस एजेंसी डीलर्स को मिलने वाला फायदा रहा पर उसके अलावा ऐसी कोई योजना शायद ही देश की जनता तक पहुंच पायी हो। योजनाओं की घोषणा कर देना या उसके लिए रूपयों का आवंटन कर देना ही सरकार का उत्तरदायित्व नहीं होना चाहिए बल्कि उसका क्रियान्वयन भी सही रूप में हो रहा है या नहीं। उस पर भी ध्यान देना योजनाओं के लागू और घोषित करने से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण स्थान रखता है।

लोकसभा का चुनाव वर्ष 2019 में है। उसके मद्देनज़र राहुल गांधी के इस तरह के भाषण उनकी तो छवि बिगाड़ ही रहे हैं साथ ही देश में 70 साल राज करने वाली पार्टी के नेतृत्व को भी बौना साबित कर रही है। शायद सच में अभी राहुल गांधी राजनीति में बच्चे ही हैं। न तो उनके भाषण में वो दम है और न ही उनकी वो शैली जो कभी कांग्रेस नेताओं में हुआ करती थी। पर कोई नहीं वो कहते हैं न कि कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती। देश में पक्ष के साथ ही विपक्षी पार्टी के नेता का सशक्त होना नितांत आवश्यक होता है कि सरकार किसी की भी बने। इन सबका निहितार्थ जनता को अधिकाधिक लाभान्वित करना होना चाहिए। यदि रक्षक ही भक्षक बनने लग जाएंगे तो जनता ही क्या उस देश का विकास और भविष्य पूर्णतया अंधकारमय हो जाएगा।

 

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