ये सड़क नहीं है साहब……

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सड़क

सड़क ! इलाहाबाद की सड़कें गाड़ियों की चकाचौंध के साथ-साथ भारत की गरीबी का घिनौना चेहरा भी साथ लिए चलती हैं। बीच में गाड़ियां तो किनारों पर उन गाड़ियों में बैठे लोगों से हर लाल बत्ती पे पैसे मांगने वाले भिखारी, मिट्टी के बर्तन और बाँस की डलियाँ बनाने वाले कारीगर।

किसी अख़बार के किनारे एक आर्टिकल में पड़ी इनकी इस हालत पे नज़र तो सबकी जाती है लेकिन मदद के लिए आगे कोई नहीं आता है, अगर कोई आता भी है तो उसके नाम पे फ़र्ज़ी NGO अपनी जेबें भरते हैं।
ऐसे में इनके पास सिर्फ अपनी स्किल बच जाती है, जिससे पैसे तो आते हैं पर इतने नहीं कि रोज़मर्रा की ज़िंदगी अच्छे से चल जाये, दो वक़्त की रोटी के अलावा शायद ही कुछ और सोच सकें। बच्चों की पढ़ाई और बूढ़े माँ-बाप का इलाज पेट काटकर करना पड़ता है।

ज़रूरत तो काफी चीजों की समझ में आ रही थी पर शिक्षा और सेहत को प्राथमिकता देना चाहिए |
दिनभर इनके बीच रहने और इनसे बात करने के बाद इनका दुःख तो समझ आया ही पर एक और बात समझ आयी की घर बनाने के लिए पैसे, इट, मिट्टी, बालू और सीमेंट की नहीं बल्कि प्यार और परिवार की ज़रूरत होती है इसीलिए सरकार से गुज़ारिश है कि संगम में मेले के समय अगर इनका घर उजाड़ना ही है तो कम से कम एक ऐसी जगह दे दी जाये जहां ये लोग सही से रह पाए क्योंकि इनकी इस हालत के ज़िम्मेदार कहीं न कहीं हम सब भी हैं !

 

ऑलमोस्ट THERE

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