मैं
यूं ही तो नही,
मैं कलम से प्यार कर बैठी।
इसे अपनी ज़िन्दगी बना बैठी।
यूं ही तो नही,
मैं शायरी करने लगी।
कुछ तो बातें इस दिल में छुपी जरूर होगी।
यूं ही तो नही,
मैं लिखने लगी।
कुछ तो भावनाएं है जो इस कलम
 की मदद से कोरे कागज पर उतरना चाह रही होंगी।
यूं ही तो नही,
ज़िन्दगी मेरी शान्त सी हो गयी।
कुछ तो घटनाएं जरूर घटित हुई होगी।
यूं ही तो नही,
मैं आगे बढ़ने की कोशिश मे लग गयी।
कुछ तो ज़िन्दगी से ठोकरे मैंने भी खाई होंगी।
यूं ही तो नही,
मैं कलम से प्यार कर बैठी।
इसे अपनी ज़िंदगी बना बैठी।

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