मैं,मेरी क़लम और ‘खूबसूरती’

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  • अंकिता मिश्रा

मैंने सोचा,
मेरी कलम ने लिखा,
और खूबसूरती पन्नों पर उतर आई। मानों बरसो से इस खूबसूरती का इंतज़ार हो रहा हो,
और आज इत्तेफ़ाक से मेरी कलम से दीदार हो गया।

आज की खूबसूरती क्या है…?
‘निर्मल’ मन नहीं
सुंदर चेहरा है,
मीठी वाणी नहीं
बातों की कठोरता है,
अंदर की पवित्रता नहीं
बाहरी दिखावा है।।।

लेकिन मेरी क़लम से लिखी ‘खूबसूरती” पन्नों पर कुछ इस तरह से उतरी……

एक गूंगे व्यक्ति की खूबसरती
उसके हाथों के इशारों में है,
एक दृष्टिहीन व्यक्ति की खूबसरती
उसके मन की रोशनी में है,
एक बहरे व्यक्ति की खूबसरती
उसके आंखो के इशारों में है,
एक बच्चे की खूबसरती
उसकी दंतुरित मुस्कान में है,
एक बूढ़े व्यक्ति की खूबसूरती
उसके अपने बचपन की यादों में है,
एक औरत की खूबसूरती
उसके अपने आत्मसम्मान में है,
एक पुरुष के खूबसूरती
उसके अपने पुरुषार्थ में है,
मौसम की खूबसूरती
सरसराती हवा की आगोश में है,
फूलों की खूबसरती
कांटों की खालिश में है,
जंगल की खूबसूरती
जानवरों की मौजूदगी में है,
और इस संसार की खूबसूरती
लोगों के सुख, समृद्धि,और कल्याण में है,

मैं जितना लिखूंगी
खूबसूरती बढ़ती जाएगी,

इसीलिए अंत में………
मेरी कलम ,आपकी क़लम और हम सब की क़लम
कुछ न कुछ लिखे,जिससे इन पन्नों की खूबसरती बढ़ती जाए।।!

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