“मेरी कलम से निहारती हुई,शाम की कुछ झलकियां”

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वो बचपन के दिन,वो सैतानियों की शाम,
वो मां के हाथों से मार खाने की शाम।।
सुबह की किरण,और परिंदो की शाम,
वो मां की गोदी में लोरी की शाम।।
याद आने की शाम,भूल जाने की शाम,
वो जा-जा कर लौट-लौट आने की शाम।।
वो ढाबे की टेबल,वो प्याले की शाम,
वो रह_रह कर हिचकियों में तेरे आने की शाम।।
सुबह की पढ़ाई,भूलों की शाम,
वो परीक्षा के एक दिन,पहले पढ़ने की शाम।।
पक्षियों की चहचहाहट ,और झींगुर की शाम,
वो दिनभर किसानों की मेहनत की शाम।।
वो जेबों में सिकुड़े हुए ,पैसों की शाम,
वो मांथे पर सदियों के बोझों की शाम।।
वो घिप्पी,वो लुका_छुपी,वो चोरों की शाम,
वो ढेरों दुआएं ,सलामत की शाम।।😊

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