माँ

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जब तक मैं जिन्द़ा रहूं,

वकत तेरी छांव तले पलता रहूं।

मुझे ख़्वाहिश नहीं महलों की,

वकत तेरी गोद में सोता रहूं।।

ख़ुदा बख़्श दे वो पल मुझे,

जिनमें मैं तेरी सेवा करूं।

तू बेटों के ख़्याल से बेफिक्र रहे,

वकत यही रब से दुआ करूं।।

तू ही तो जीवन का आधार है,

तुझको कैसे शब्दों में बयां करूं।

ख़ुद भूखा रहकर तू पेट भरा बताती है,

माँ तेरी तारीफ़ मैं भला कैसे करूं।

तू वकत माँ नहीं ख़ुदा ही है,

तो कैसे कविता में ढाल सकूं।

जब तक माँ मैं तेरा बेटा या बेटी रहूं,

वकत तेरे आंचल से लिपटा रहूं।।

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