भारत के एक सभ्य समाज की विडम्बना

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  • अर्पित चंसोरिया 

आतंकवादी अफ़ज़ल गुरु के समर्थन में नारे लगाने वाले कुछ लफ़ंगो को सरकार एवं समाज के तथाकथित कुछ सभ्य लोग उनके ख़िलाफ़ खड़े हो जाते हैं एवं देश के एक सर्वोच्च शिक्षण संस्थान को आतंकवादियों का अड्डा घोषित कर देते हैं सिर्फ़ और सिर्फ़ कुछ लफ़ंगो के कारण।इस आधार पर तो रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमन जी भी देशद्रोही हुईं।हालाँकि वे तथाकथित बुद्धिजीवी लोग तुच्छ मानसिकता के थे परंतु आज वहीं जब राष्ट्रपिता के हत्यारे नाथूराम गौडसे के जयकारे लगाने वाले लोगों को सच्चा राष्ट्रवादी समझा जाता है और हद तो अब हो गयी है जब उस आतंकवादी गोडसे का मंदिर बनने जा रहा है और सरकार,सम्पूर्ण मीडिया व वे सभी बुद्धिजीवी लोग ज़ुबान पर ताले लगाये हुए बैठे हैं।

मैं किसी के बयान का समर्थन नहीं कर रहा हूँ बल्कि मैं स्वमं अफ़ज़ल गुरु को आतंकवादी बोल रहा हूँ।उसने भारत की अस्मिता व लोकतंत्र के मंदिर पर हमला किया और उसका अंजाम वही हुआ जो होना चाहिये था।

हम उस देश में रह रहे हैं जहाँ एक आतंकवादी को अपना आदर्श मानने वाले ग़द्दार वहीं दूसरे आतंकवादी को आदर्श मानने वाले सच्चे राष्ट्रवादी कहलाये जाते हैं।और इस लिस्ट में सरकार में बैठे कुछ लोग भी शामिल हैं।

प्रधानमंत्री साहब के मुँह से जब भी गांधी जी के लिये भाषण सुनता हूँ तब ही तब मशहूर शायर फ़ैज़

साहब का एक शेर याद आता है:-

“तेरे ख़त आज लतीफ़े की तरह लगते हैं,
जब भी जब उसमें लफ़्ज़-ए-बफ़ा आता है”
और साथ ही साथ मुझे डर इस चीज़ का भी सताता है के जो हाल आज गांधी जी का हो गया है आने वाले समय में वही हाल ए॰पी॰जे॰ अब्दुल कलाम साहब का न हो जाये।

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