पास जा कर देखिये

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नेता नहीं इक मुकम्मल इंसान तो बनिये।

पसीने और सितम से तर-बतर किसानों के

उस दर्द को महसूस तो कीजिये।।

पास जा कर देखिये,

प्रकृति की ख़ूबसूरती से दिल तो लगाइये।

इस ख़ुश्क हो चुकी वसुंधरा में,

भविष्य की सांसों के लिए पेड़ तो लगाइये।।

पास जा कर देखिये,

महरूम व बेबस अत्फ़ालों के दर्द को तो समझिये।

रूह से महसूस करोगे तो आब-ए-चश्म बह जायेंगे,

कभी उनसे मिल करके तो देखिये।।

पास जा कर देखिये,

बयानबाज़ी और झूठे वादे करने वाले तो नहीं चाहिये।

जहाँ मानवता तड़पे और अन्नदाता बेज़ार-सा लगे,

विकास का वो स्वरुप लाने वाले तो नहीं चाहिये।।

पास जा कर देखिये,

लोगों की तकलीफ़ें व समस्याएं तो समझिये।

समाज की उन पुरातन दकियानूसी परम्पराओं को

नक़ाबों की परतों से बेनक़ाब तो कीजिये।।

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