न जाने तुम कब आओगे?

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जितेन्द्र पाण्डेय जीत

24 जून, 2005   जी हां, यह वही तारीख़ है, जिस दिन इलाहाबाद विवि को केन्द्रीय विवि का दर्जा प्राप्त हुआ पर आज की ताबीर भी कुछ अलग है और हालत भी कुछ ख़स्ताहाल। इसकी शिफ़त से तो हर कोई वाकिफ़ है कि इसका वज़ूद क्या है? यहां से कितनी नामचीन शख़्सियत विश्व पटल पर शोहरत की बुलन्दियों को छू रहे हैं या छुआ है परन्तु जनाब़ बीती शिफ़त के बलबूते वक्त के साथ वक़त फीकी पड़ती जाती है। वक्त के साथ कर्मों के बलबूते उसे और सुदृढ़, सुसज्जित और अलंकृत करना पड़ता है। गांव या शहर कहीं का भी बच्चा न जाने कितने सपनों संजोए और उम्मीदें जगाए ज्ञान के मन्दिर में प्रवेश करता है और इस सोच के साथ बाहर निकलता है कि अब की बार उनका दीक्षांत समारोह होगा लेकिन अफ़सोस उसका ये सपना टूट जाता है। मुझे तो याद भी नहीं कि पिछला दीक्षांत समारोह कब हुआ था? शायद विवि प्रशासन की उदासीनता का शिकार हो चुका है या फिर किसी ऐसी कालकोठरी में डाल दिया गया है या कहें गुम-सा हो गया है, जिसकी थाने में गुमशुदगी की रिपोर्ट भी नहीं लिखी जा सकी। आज हम 21वीं सदी में जी रहे हैं, जहां प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में प्रतिदिन नए-नए आविष्कार होते जा रहे हैं परन्तु विवि की डिग्री का स्वरूप और आकार जस का तस ही अपना रूप धारण किए हुए है, जो पुराने समय से चला आ रहा है।

बदलाव तो समय की मांग होती है। क्या डिग्री के आकार व स्वरूप को बदलना न्यायोचित या समय की मांग नहीं है? क्या एक केन्द्रीय विवि का दर्जा रखने वाले विवि में दीक्षांत समारोह का होना न्यायोचित या तर्कसंगत नहीं है?  न जाने कितने सवाल हैं, जिनके जवाब कहीं धूल खाती फाइलों में दफ़्न है या प्रशासन की उदासीनता के गहरे समंदर में गोते लगा रहे हैं। सोचने वाली बात है कि पटना का एक छोटा-सा विवि हर वर्ष दीक्षांत समारोह आयोजित कर लेता है पर केन्द्रीय विवि का दीक्षांत समारोह न जाने कब से किसी कोठरी में कैद है। न जाने कब वो दिन आएगा और न जाने कब इसे गुमनामी कैद की सलाख़ों से मुक्त किया जाएगा या फिर यही हाल बदस्तूर जारी ही रहने वाला है।

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