नारी

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मुझे अपने देश की महिलाओं से सम्बंधित उन सभी परम्पराएं प्रभावित करती हैं, जिनमें केंद्रबिंदु एक नारी होती है। चाहे वो मंदिरों में उनके प्रवेश न करने की परंपरा हो या मासिक धर्म के दौरान उनका मंदिरों में प्रवेश वर्जित, रसोई घरों में प्रवेश वर्जित या उन्हें एक अछूत या गुनहगार के माफ़िक व्यवहार करने की परंपरा। 21वीं सदी में जी रहे हैं हम पर हमारी सोच वही दकियानूसी ही है।

अरे माँ बनने की प्रक्रिया अछूत लगती है हमारे समाज को पर अपना बेटा या बेटी सभी को चाहिए। मैं ये जज़्बात किसी को प्रभावित करने के लिए नहीं लिख रहा या लाइक्स बटोरने के लिए नहीं लिख रहा। बस लिख रहा हूँ जो मुझे या मेरी नज़र में लगता है कि ये बदलना चाहिए। आख़िर कब वो वक़्त आयेगा जब बंदिशें न होंगी, उन्हें भी जीने का हक़ है पर लोगों द्वारा कहा जाता है स्वतंत्रता स्वच्छन्दता में बदल जाती है। पर ये तो उनके ऊपर होना चाहिए न कि वो इतनी काबिल हैं कि उन्हें पता है उनके लिए क्या सही है क्या गलत? और जो जैसा करता है, उसे अपने किये का भोगना पड़ता है। तो फिर जबर्दस्ती परम्पराओं में लादना क्या न्यायोचित है?

जानता हूं कइयों को ठेस और गुस्सा भी लगेगी पर ये मेरी सोच है बाकि मुझे LKK से फ़र्क नहीं पड़ता क्योंकि जीने का सलीका और ज़िंदगी में साथ अपने माँ-बाप और परिवार ही देता है न कि ये समाज। समाज आवश्यक है इंसान को एक मुक्कम्मल इंसान बनाने के लिए।

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