तेरी कमी

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तेरी कमी
हाँ बहुत मन करता है हँसने का
फिर से साथ बैठ कुछ बातें करने का,
गुजारे लम्हें याद कर मुस्कुराने का
वापिस से तुझे अपने पास बुलाने का।
क्यों तू अब मुझसे इतना दूर है
क्यों अब मुमकिन नही तेरा वापिस से लौट आना,
ऐसा नही है तेरी कमी सताती नही
बस अब ये आँखे कुछ बताती नही।
हर रात सोचती हूँ तुझे
हर दफा अपनी किस्मत को कोशती हूं मैं,
हाँ मेरा प्यार, मेरा जहांन तू ही था
पर न जाने क्यों खुदा को तेरा मेरे पास होना मंजूर ही न था।
कोशिश अभी भी वैसे ही करती हूँ मुस्कराने की
जैसे उन सात आठ सालों पहले मुस्कुराया करती थी,
पर न जाने क्यूं ये चेहरा हँसता और दिल रोता रह जाता है,
जो पास था वो अब दूर है शायद ये भुला नही पाता है।
तेरी याद न आकर भी आ जाती है,
तेरी कमी आज भी कहीं खल जाती है ।

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