तालिबानी बनाम हिंदुस्तानी न्याय व्यवस्था

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तालिबानी
  • अर्पित चंसोरिया 

तालिबानी बनाम हिंदुस्तानी न्याय ! आज कल सोशल मीडिया पर वर्तमान संसदीय व्यवस्था को फ़ॉलो करने का प्रचलन बन गया है। आप सवाल पूछिये उसके जवाब में सत्ता पक्ष आपसे इतिहास से उस से मिलती जुलती किसी घटना पर काउंटर प्रश्न कर देगा।विपक्ष सवाल का जवाब खोजने में लगा रहेगा तब तक मुद्दा शांत हो जायेगा,बाद में फिर कोई नयी घटना फिर कोई नया सवाल और हालात जस के तस।पर वर्तमान में हुई घटना भी आने वाले समय में इतिहास बनेगी फिर वर्तमान को भविष्य में इतिहास मानकर उस से प्रश्न किया जायेगा।समस्या का हल खोजने की जगह इतिहासों पर बातें की जायेंगी जैसे कि बताने पर कोई टाइम मशीन बन कर आयेगी फ़्रांस से राफ़ेल की तरह उस में बैठ कर भूत काल में जा कर पूर्व में हुई घटनाओं को ठीक किया जायेगा।वर्तमान समस्याओं का तो क्या है संभली तो ठीक वर्ना टाइम मशीन तो है ही अपने पास।क्या इस से हालातों में सुधार होगा???

अभी 2-3 दिनों से देख रहा हूँ मॉब लिंचिंग की घटनाओं पर इतिहास को लेकर या अन्य घटनाओं की बात करके मुद्दे से ध्यान भटकाया जा रहा है।इसमें दिल्ली में हुआ अंकित हत्याकांड,कश्मीर में हो रही पत्थरबाज़ी,कासगंज घटना आदि शामिल हैं।उन घटनाओं से जुड़े तथ्य जान लीजिए एक बार। पहली बात अंकित के पिता ने साफ़ साफ़ मीडिया में कहा है कि उनके बेटे की मौत पर सम्पूर्ण समुदाय को बदनाम न किया जाये….और दूसरी बात अंकित की हत्या की गयी थी जो कि एक ओनर किलिंग का मामला है…..शायद कुछ लोगों को मॉब लिंचिंग व ओनर किलिंग में अंतर नहीं पता। दूसरी बात चंदन गुप्ता की मौत समाज को कलंकित करने वाली घटना थी जिसमें दोनों समुदाय शामिल थे। घटना में गोलीबारी दोनों तरफ़ से हुई थी।जब हिन्दुवादी सेना किसी मुस्लिम बस्ती से निकलती है तो किस तरीक़े के भड़काऊ भाषण लगाते हैं ये मुझे अच्छी तरह से पता है…..

जिस समय हिंदुवादी सेना वहाँ से निकल रही विडियो में साफ़ साफ़ नारे सुनाई दे रहे थे “हमारा है ये हिंदुस्तान,कठुओं को भेजो पाकिस्तान” जैसे नारे सुनाई पड़ रहे थे।पर जो था घटना सरासर ग़लत थी भीड़ को संयम नहीं खोना चाहिये था।वह असंयमित भीड़ एक परिवार के लाल को लील गयी।अपराधियों को जल्द से जल्द और कड़ी से कड़ी सज़ा मिले। तीसरी बात पत्थरबाज़ों की तो सरकार आपकी है उस पर भी यदि एक जवान के हाथ में बंदूक़ होते हुए भी उसे एक लफ़ंगा थप्पड़ मार रहा है तो वो थप्पड़ उस जवान को नहीं सरकारी गालों पर पड़ रहा है….. अब आता हूँ आपकी बंगाल और केरल वाली बात पर…..जो हो रहा है उधर वो बेहद निंदनिय है आख़िर राजनीति के नाम पर किसी ग़रीब मजलूम की हत्या करना सरासर क़ानूनन अपराध ही नहीं पाप है पाप…… पर एक मिनट रुकिये….समय में ज़रा पीछे चलिये…..ये सब व्यवस्था दी हुई किसकी है??? किसी को प्रेम से गले लगते देख प्रेम बाँटते देख आप लोगों के तन बदन में सिहर कर आग लग जाती है…..और ऐसी घटनाओं पर आपको मसाला मिलता है,मज़ा आता है। मैं यह दोनों घटनाओं के लिये लिख रहा हूँ…..बंगाल में जो हो रहा है और अलवर में जो हुआ है…..आख़िर हम आज एक कैसे समाज की कल्पना कर रहे हैं वो भी उस स्थान पर जहाँ विश्व की पहली सभ्यता विकसित हुई है। आज यदि यही हालात रहे तो आने वाले समय में हर इंसान अपने घर से निकालने में कतरायेगा….

सोचेगा एक समय जिस भीड़ को देख कर वह ख़ुश हुआ करता था आज वही भीड़ अपनी तृष्णा शांत करने के लिए आज कहीं उसे ही अकारण अपने काल का ग्रास न बना ले…अभी तो उसके बच्चे भी छोटे हैं पर अब तक मैं जिसे भीड़ के हाथ का निवाला बनते देखता था वे भी किसी बच्चे के बाप होंगे….उनके बच्चे भी उनका घर पर वैसे ही इंतिज़ार कर रहे होंगे जैसे मेरे बच्चे कर रहे होते हैं और इसी डर के साथ इंसान जियेगा क्योंकि यही तो वो समाज में फैला रहा था जो कि घाव अब नासूर बन चुका है….. दअरसल अब पालतू कुत्तों के मुँह ख़ून लग चुका है जिसकी लालसा में वे अब अपने मालिकों को भी नहीं बख़्शने वाले देख लीजियेगा…. आख़िर आज हम कैसे समाज की कल्पना कर रहे हैं….

ऐसे समाज की जिसमें एक व्यक्ति घर से निकलते वक़्त ये सोचे कि आज मुझे कितने लोग प्रेम से गले लगायेंगे या ऐसे समाज की जिसमें लोग ये सोचें कि घर से बाहर जा तो रहा हूँ पर क्या पता लौटूँ भी या नहीं। अब करता हूँ घटना की बात जो अलवर में हुई है।पहली बात ये तय करने का अधिकार किसको है कि वो व्यक्ति गौतस्कर था….भीड़ को या न्यायालय को????और दूसरी बात यदि मान लेते हैं कि वो गौतस्कर था भी तो उसकी सज़ा तय करने का अधिकार किसको है????भीड़ को या न्यायालय को???? कुछ लोग इसे न्यायोचित बता रहे हैं।दुःख होता है ऐसे लोगों की मानसिकता को देख कर….

आज जो लोग इन घटनाओं को देख कर प्रसन्न हो रहे हैं न उन्हें ये आभास नहीं है कि वो भारत को किस दिशा की तरफ़ मोड़ रहे हैं।कुछ कुछ ऐसा ही प्रारम्भ में अफगनिस्तान व सीरिया में हुआ था।कुछ लोगों को इन देशों की तुलना भारत से करना नाग़वार गुज़रे लेकिन सत्य यही है।उधर प्रारम्भ में ऐसी जो घटनाएँ हुईं उनके क्या भयवाह परिणाम निकले वो हम सबने देखे हैं।पर सोच कर देखिये क्या यह उसी तरीक़े के समाज के इमारत की नींव नहीं डाली जा रही है।फ़र्क़ बस एक है इन दोनों घटनाओं में की उधर ये सब इस्लाम के नाम पर हुआ यहाँ अब तक समझ नहीं आ रहा क्यूँ हो रहा है क्योंकि इस भीड़ का शिकार सिर्फ़ मुस्लिम ही नहीं ख़ुद हिंदू भी हैं कई।

अंत बस एक सवाल के साथ करना चाहूँगा कि क्या तालिबानी न्याय व्यवस्था और हिंदुस्तानी न्याय व्यवस्था में फ़र्क़ होना चाहिये या नहीं।और यदि नहीं,ऐसा ही समाज चाहिये तो दिल पर हाथ रख कर जवाब दीजियेगा कि शशि थरूर ने क्या ग़लत कहा।

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