जातिवाद बनाम सांप्रदायिकता में राष्ट्रीयता कहां है ?

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हमारा देश भारत जो पूरब से लेकर पश्चिम तक उत्तर से लेकर दक्षिण तक विभिन्न धर्म ,वेशभूषा ,संस्कृति, भाषा, भौगोलिक परिवर्तन तथा और भी कई तमाम तरह की विशेषताओं से संपन्न है। इतनी विभिन्नताओं  के बावजूद एकजुटता की भावना को सार्थक करना भारत की विशेषता रही है। हम हमेशा इन शब्दों को अवश्य सुनते हैं “अनेकता में एकता का भाव” परंतु क्या वास्तव में ऐसा है? क्या मौजूदा परिस्थितियां एकता का उदाहरण है? जहां राजनीति का दूसरा नाम “जातिवाद” है. जहां सांप्रदायिक दंगों को तूल देना राजनीति को और शिखर तक पहुंचाती है का दूसरा नाम जातिवाद हैं।

जहां सांप्रदायिक दंगों को तूल देना राजनीति को और शिखर तक पहुंचाती है। जहां किसी एक समूह या विशेष वर्ग को विशेष दर्जा दिया जाता है। जिसकी पहचान उसकी जाति तथा धर्म से होती है। जहां आरक्षण आर्थिक असंपन्नता के आधार पर नहीं जाति के आधार पर दिया जाता है। जहां एससी एसटी एक्ट लाकर बिना जांच के गिरफ्तारी का आदेश दिया जाता है। जहां गौ तस्करी के नाम पर लोगों को पीट-पीटकर मार दिया जाता है। राजस्थान के अलवर का मामला जहां गौ तस्करी के मामले में अकबर खान की बेरहमी से पीट-पीटकर हत्या कर दी गई। बीते कुछ दिनों से देश में कई तमाम जगहों से ऐसी घटनाएं सामने आई अभी हाल ही में भीमा कोरेगांव का मामला जहां 31 दिसंबर 2017 को दलितों के समाज में भड़काऊ भाषण देकर एक विशेष जाति को भड़काने का घिनौना कृत्य सामने आया।

पहले भी कई राजनेताओं ने इस कार्य को बड़ी सरलता पूर्वक क्रियान्वित किया है जिसमें ज्यादातर हिंदू मुस्लिम समाज शामिल है। परंतु सोचने वाली बात यह है कि इस लोकतांत्रिक देश में जनता अपने बहुमूल्य मतों का उपयोग कर देश का प्रतिनिधि चुनती है। देश को अलग करने के लिए? या देश के विकास के लिए? इस जातिवाद और सांप्रदायिकता से भरी राजनीति मे राष्ट्रीयता कहाँ है? राष्ट्रीयता  तब होगी जब देश का प्रतिनिधि देश के सभी वर्ग के लोगों के लिए रोटी कपड़ा मकान और सबसे जरूरी शिक्षा पर जोर देगा ना कि  भड़काऊ भाषण देकर उनमें फूट डालने की। आवश्यकता  देश के समूचे वर्ग के विकास की है। अगर हम यूं ही आपस में लड़ते रहे तो विकासशील देश से विकसित देश होने का सपना सपना ही रह जाएगा।

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