#क्या_लिखूं

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  • अंकिता मिश्रा

क़लम लिखूं कि, दवात लिखूं,
या दोनों की आवाज़ लिखूं,
या संगम की तीनों नदियों का,
बहता नीर,पीयूष लिखूं।।
धर्म लिखूं कि, जाति लिखूं,
या देशद्रोह अपार लिखूं,
या ढलता सूरज पश्चिम में,
दो देशों के मध्य की बात लिखूं।।
मूंक लिखूं कि,वाचाल लिखूं,
या वधिरों के जज़्बात लिखूं,
या आंखों में अरमान लिये,
उन अंधों का एहसास लिखूं।।
जीत लिखूं कि, हार लिखूं,
या ख़ुद का स्वच्छंद विचार लिखूं,
शक की बढ़ती गहरी खाई,

 

या ऊपरी सतह की बात लिखूं।।
कुछ समझ नहीं आता मुझको कि,
बारिश की बरसात लिखूं,
सर्दी में गिरती ओस की बूंद,
या लिखता फूल गुलाब लिखूं।।
तीज़ लिखूं कि,त्योहार लिखूं,
या मेल-मिलाप की बात लिखूं,
या सभी धर्मों में ज्यों का त्यों,
जो हो रहा वहीं रिवाज़ लिखूं।।
धूप लिखूं कि,छांव लिखूं,
या परछाई का बिंब लिखूं,
या पक्षियों के उन्मुक्त गगन में,
विचरण का सुन्दर दृश्य लिखूं।।
तुम्हें पास लिखूं कि,दूर लिखूं,
या चलती बस की रफ़्तार लिखूं,
या यादों कि बारात तले,
हाल-ए-दिल की कुछ बात लिखूं।।
दिन लिखूं कि,रात लिखूं,
या खामोशियों से होती बात लिखूं,
या जीवन के अंतिम क्षण में,
पल दो पल की तकरार लिखूं।।
तनिक लिखूं कि,भरमार लिखूं,
या शब्दों का भंडार लिखूं,
या ‘क’ कबूतर के जैसा,
ख़त पहुंचाने का मार्ग लिखूं।।
खेत लिखूं कि,खलिहान लिखूं,
या शहर में बसते लोग लिखूं,
या तरू के निर्मल छांव तले,
बचपन की अनोखी बात लिखूं।।
हिंदुस्तान लिखूं कि, पाकिस्तान लिखूं,
या अपने हिस्से का श्मशान लिखूं,
या ख़ून की नदियों से लथपत,
पूरा बहता ब्रम्हाण लिखूं।।

 

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