29/10/2018 से लगातार सुनवाई की बात थी, लेकिन हुआ क्या,फिर से तारीख और सिर्फ तारीख पे तारीख़।
मामला बहुत गम्भीर है और कोर्ट भी नहीं चाहेगी कि जल्दबाजी में कोई फैसला करे, पर जो सबसे बड़ा सवाल उठता है वो ये कि क्या भाजपा मंदिर की राजनीति नहीं कर रही? याद दिलाते चले कि 2014 के लोकसभा को जीतने के लिए इसी भाजपा ने भगवान राम का सहारा लिया था।

इनके नेताओं के मुँह से कुछ निकले ना निकले पर राम मंदिर के निर्माण की बात जरूर निकलती थी,पर आज इसी भाजपा को साँप सूंघ गया है और भगवान राम के जन्म भूमि को मुद्दा बना के 2019 में उतरने की तैयारी में है।

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सवाल अब ये उठता है कि क्या भाजपा अध्यादेश लाकर मामले को रफा-दफा नहीं कर सकती क्योंकि वो सिर्फ मंदिर नहीं बल्कि वो एक आस्था का बहुत बड़ा मुद्दा बन चुका है और सुप्रीम कोर्ट का 3 महीने का समय लेना ये बताता है कि कहीं न कहीं राजनीति हो रही है राम मंदिर पे या फिर अध्यादेश की तैयारी भी हो सकती है।

राम मंदिर निर्माण का रास्ता साफ करने की मांग जोर पकड़ रही है और 6 दिसंबर को भारत बंद ,अयोध्या चलने की बात की जा रही है।

ये सब नाटक देख के एक किसी का लिखा हुआ कविता याद आता है:-

राम तुम्हारे भारत मे,सत्ता का खेल अनोखा है
अपने घर के लोगो ने ही,राजतिलक को रोका है
न्यायपालिका सत्ता का,केवल मशवरा मसौदा है
राम तुम्हारे मंदिर का बस,राजनीति का सौदा है
भारत का जनमानस आहत, सत्ता के छलछन्दों से
राम तुम्हे भारत मे रहना होगा,अब अनुबंधों से
पहले 14 वर्षो का लेकिन,अब मिला असीमित है
राजनीति में राम से बढ़कर, सिंहासन की कीमत है
धर्म जा रहा सदन छोड़ कर, दिल्ली के दरबारों से
अंतर कलह जवान हो गई,भारत की सरकारो से
नही लालसा मंदिर की,केवल सत्ता के प्यासे है
प्रभु राम के मंदिर से,होने दूंगा व्यापार नही
उसे देश से जाना होगा,जिसे राम से प्यार नही
मंदिर वाली राजनीति का,अब होगा दस्तूर नही
सत्ता से बाहर रहना होगा,वो दिन भी अब दूर नही।

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