केदारनाथ जी की याद में !

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  • सुधीर कुमार यादव 

अगर ध्यान से केदारनाथ को पढ़ा जाये, तो मालूम होता है कि कविता भी शोध है। चार लोगों के झुंड में बैठे हुए अचानक किसी कवि से तुरंत एक कविता बनाने को कह देना शायद कवि के साथ कविता से भी मजाक करना होता है। तुरंत में हम कटाक्ष कर सकते हैं, व्यंग कर सकते हैं। किंतु ये सब क्षणिक ही रहते हैं।

कविता को जीवंत बनाने के लिए केदार की तरह शोध करना पड़ेगा। पुरानी, लंबी यादों को सहेजना पड़ेगा। दादी की दादी की बातों में खोना पड़ेगा। हल चला रहे किसान के फ़टे कुर्ते को निहारना पड़ेगा। उससे कुछ कहना पड़ेगा। उसकी हाँफती सांसों को सुनना पड़ेगा। उसमें एक ठहराव आएगा, वहाँ रुकना पड़ेगा। उसी वक़्त कोट में दबे विलायती बाबू के बारे में भी सोचते रहना पड़ेगा। तब जाकर केदार सी एक लाइन निकेलगी- ‘दिन के इस सुनसान पहर में रुक-सी गई प्रगति जीवन की’।

आज केदार जी हमारे बीच नहीं रहें, लेकिन उनकी कविताएं हम पर शोध करती रहेंगी। बहुत ही आसान शब्दों की कविताएं। एक-एक साधारण से शब्द को सीधी पंक्तियों में गहरे अर्थ देकर गुजर जाने वाले कवि का रोज हमारी ज़िन्दगी में आना-जाना लगा रहेगा। अलग बात है कि हम उनके चेहरे को उनका नाम ना दे पाएं। जेएनयू के जंगलों में जिस ‘दुपहरिया’ को उन्होंने जिया है, उसे हमारा गुरुर नाम नहीं देने देगा। दोपहर कहने वाले हम ”सभ्य समाजवासी” ना ही ‘दुपहरिया’ जी पाएंगे और ना ही केदार के आधार को समझ पाएंगे।

जिसने भोजपुरी को अपना घर बता हिंदी के देश पर राज किया, और जिसने दोनों का सम्मान बढ़ाया, वो केदार सदा असरदार रहेगा। वो केदार बार-बार मुझे बताने आएंगे कि जब वर्षा शुरू होती है तो क्या-क्या होता है। मैं शोध करूँगा, अपनी ज़िन्दगी पर, आपकी जिंदगी पर, सूखते पेड़ों पर, अकुलाते जानवरों पर, लौटती नदियों पर और कुंठलाती मंजरियों पर। अभी कई शब्द मेरी पहुँच के बाहर हैं, उनके बिना मैं शांत हूँ। कल्पनाएं कभी नहीं बोलती, शब्द ही कल्पनाओं की आवाज़ हैं। मुझे आवाज़ ढूँढना है अभी।

कविताकोश ने प्रकाशन के लिए मेरी कविताएं मांगी है। लेकिन सोचता हूँ कि अभी और निहारा जाये दुनिया को, अभी और शब्द जुटाये जाएँ कि उनकी कल्पनाओं को आवाज़ दे सकूँ जिनके हल चलाने से मिट्टी रोकर फसल उगा देती है। मुझे अभी और वक़्त लेना चाहिए, कि कुछ भी से बेहतर हो कि कुछ बेहतर भेजा जाए। Shambhavi आप क्या कहती हैं? संस्कृति एवं रचना को लेकर आपकी राय मेरे लिए कितना महत्त्व रखती है, आप जानती ही हैं। और आपके ही जरिये हम कविताकोश के कोष में प्रवेश पा सके हैं….

केदारनाथ जी के जाने को उन्हीं की एक कविता से याद करते हैं-

‘मैं जा रही हूँ’ – उसने कहा।
‘जाओ’ – मैंने उत्तर दिया।
यह जानते हुए कि जाना
हिंदी की सबसे खौफनाक क्रिया है.

 

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