काग़ज का गोला

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“चारों ओर घना अँधेरा था मगर इतना भी नहीं कि मैं कुछ देख ही न पाऊँ। रौशनदान जैसे छोटे छोटे छेदों से छन कर आती मद्धम मद्धम रौशनी वहाँ कुछ उजियारा तो बना ही रही थी। कुछ परछाई से जिस्म, वही पुराने चेहरों के साथ बार बार इधर उधर आ जा रहे थे। कुछ जिस्म लड़कियों के थे तो कुछ औरतों के, सब अपने में मगन। कुछ औरतें पास ही बैठी एक बड़ी सी थाली में चावल लिए उसके कचड़े साफ कर रही थीं और आपस में आस पड़ोस की बातों से मन भला रहीं थीं। एक गन्दा सा बिस्तर भी था, जिस पर कुछ बहुत पुराने और गंदे से गद्दे डले हुए थे। ऊपर से एक मटमैली चादर भी बिछाई गई थी। बिस्तर के बाजू में एक मूसल और उसके बगल में कुछ डिब्बे, जो तक़रीबन 15 लीटर के रहे होंगे। देखने से मालूम हो रहा था कि कुछ पिसान भरा हुआ है। दूसरी ओर अनाज की कुछ बोरियाँ थीं जो हाल फिलहाल में ही रखी गई जान पड़ती थीं। एक कमजोर सा दरवाजा जो खोलने पर खुलने से ज्यादा चुर्र चुर्र की आवाजें करता था। दरवाजे के पीछे एक बड़ी मोटी सी लाठी। लाठी के बगल में एक गंडासा, जो शायद किसी चोर लुटेरे को डराने के लिए रखा गया हो या फिर उसका कुछ और ही काम रहा हो। वो कुछ एक 20×20 का बड़ा सा कमरा मालूम पड़ता था जिस पर प्लास्टर की एक परत भी नहीं थी। उस कमरे में एक टाँड़ भी था जो एक साड़ी से बने हुए पर्दे से ढँका हुआ था मगर फिर भी उसके उधर का सब कुछ बख़ूबी दिखाई पड़ रहा था। पर्दे के पीछे पूरा टाँड़ कंडियों से भरा हुआ था। किसी बिल्ली के दो छोटे छोटे बच्चे, जो अपनी माँ से बिछड़े हुए लग रहे थे, बार बार आवाज करते हुए कभी उस कमरे से बाहर जाते तो कभी आकर बिस्तर के नीचे बैठ जाते। कमरे के बाहर ही कुछ दूर पर मिट्टी के दो चूल्हे आपस में सटे हुए बने थे। मानों एक दूजे को गले से लगाये, हाथ पकड़े हों। उसको कंडियों से जलाया गया था। उस पर कुछ पक रहा था। चूल्हों से उठता धुआँ कमरे में कोहरे सा भर हुआ था। उस कमरे की दीवारों का कालापन जाहिर कर रहा था कि वो चूल्हे का धुआँ ही था जिसने इतनी बेतकल्लुफी से उस कमरे का मेकअप कर उनको सजाया था।

कमरे के बीचों बीच पड़ा वो पुराना बिस्तर कुछ लचका हुआ मालूम पड़ रहा था। दो जिस्म उस बिस्तर को नीचे की ओर लचका रहे थे। दो जिस्म जो न हिल रहे थे और न ही लब खोल रहे थे। वो दो मूक और बेजान लाशों से जिस्म बिस्तर पर कुछ यूँ पड़े थे कि उस पुराने गद्दे और मटमैली चादर में सिलवटें आ गई थीं। पूरा का पूरा कमरा ख़ामोशी में गूँज रहा था। वहाँ ख़ामोशी की आवाजें चीख़ रही थीं और कुछ ख़ामोशी के गाने भी बज रहे थे। कमरे के बाहर सब कुछ सामान्य सा, चहल पहल से भरा था मगर बिस्तर पर पड़े वो जिस्म फिर भी ख़ामोश थें। उम्र में कुछ एक जैसे थे दोनों, फ़र्क था तो बस  उनके केवल लड़का और लड़की होने का। उन जिस्मों में हरकत होती है और वो एक दूसरे का हाथ थाम लेते हैं। आँखें दोनों की ही एक दूसरे को एक टक निहार रही थीं। मानों आँखों ही आँखों में सारी बातें कह रहे हों, हाथों से ही सब कुछ महसूस कर रहे हों, आँखों से ही सारे सवाल कह ले रहें हों और हाथों से ही जवाब महसूस कर ले रहे हों। उनकी आँखों में एक लंबे अर्से की जुदाई साफ झलक रही हो। सवाल तो कई रहे होंगे, बातें तो बहुत रही होंगी दोनों की, मगर इतने समय की जो आँखों की प्यास थी वो आज पहले बुझ रही थी। बीच में पलकें झपकने से एक दो बून्द आँसू के भी अपनी मौजूदगी दर्ज कराने लगते थे। हाथों की पकड़ मजबूत होती तो लगता मानो वो एक दूजे को गले लगा रहे हों। सारे गिले शिक़वे तो आँसुओं में ही निकल गए थे। दोनों के होंठ मन्द मन्द मुस्कुरा रहे थे, मानों इन चन्द मिनटों के दीदार ने उनके सब दुःख हर लिए हों।”

राह चलते जब कोई काग़ज का गोला पैरों से टकराता है तो हमेशा वो कचरा ही नहीं होता, कभी कभी वो कुछ दौलतों से भी बहुत ऊपर होता है- इस बात का अहसास मुझे सड़क पर पड़े उस काग़ज के गोले को पढ़ कर हुआ जिसे मैं महज कचरा समझ कर कचरेदान में डालने जा रहा था।

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