कारवाँ गुज़र गया गुबार देखते रहे

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कारवाँ गुज़र गया गुबार देखते रहे,

बलात्कार कर जाये दरिंदें हम उन्हें मासूम समझते रहे।

बना दो कुछ नियम ऐसे ज़नाब,

करना तो दूर ऐसी सोच रखने वालों की रूह कांपती रहे।।

कारवाँ गुज़र गया गुबार देखते रहे,

ये कैसा विकास है जहाँ बच्चे भूख़ से बिलखते रहे।

देना ही है तो रोटी, कपडा व मकान दो,

वो नहीं जिसकी चाह में इंसान इंतज़ार करता रहे।।

कारवाँ गुज़र गया गुबार देखते रहे,

इंसान के आगे ही इंसानियत दम तोड़ती रहे।

कर दिखाओ कुछ ऐसा कि

दुनिया मरने के बाद भी याद करती रहे।।

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