एक्प्रेशन क्वीन श्रीदेवी को श्रद्धाजंलि

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  • जितेन्द्र पाण्डेय “जीत”

एक ऐसी अदाकारा जिसने अपनी अदाकारी की बदौलत हर किसी की दिलअजीज़ बनीं। आज वो अपनी मौत के तीसरे दिन हमेशा के लिए नींद के उस अज्ञातवास में चलीं गईं, जहाँ से कोई वापस नहीं आता। उन्होंने एक्प्रेशन की वो नए आयाम बनाए, जिसके कारण उन्हें एक्प्रेशन क्वीन कहा जाता है। चांदनी, लम्हें, सदमा, मिस्टर इंडिया, मॉम, इंग्लिश-विग्लिंश जैसी न जाने कितनी फिल्मों ने आपने अभिनय का वो रूप प्रस्तुत किया कि लगता ही नहीं कि किरदार में श्रीदेवी है या श्रीदेवी किरदार में। रूप की रानी का कल पार्थिव शरीर दुबई से अपने वतन आने के बाद आज अंतिम दर्शन देकर हमेशा के लिए पंचतत्व में विलीन हो गईं।

मौत तो जीवन का वो कड़वा सच है, जिसे कोई झुठला नहीं सकता चाहे वो एक आम इंसान हो या कोई ख़ास। जिन्द़गी एक ख़ूबसूरत झूठ है तो मौत एक दर्दनाक सच। मृत्यु में कोई भ्रष्टाचार नहीं होता, सिर्फ़ ईमानदारी होती है, वहीं जीवन भ्रष्ट आचरण से भरा पड़ा होता है।

आज उनके अन्तिम दर्शन के लिए लोखंडवाला के सेलिब्रेशन क्लब में उनके करोड़ों चाहने वाले प्रशंसकों के साथ ही फिल्मी जगत की हर एक छोटी-बड़ी शख़्सियत मौज़ूद रही और उनकी ख़्वाहिश कि उनकी मौत के वक़्त सबकूछ सफेद हो, वो माहौल जरूर रहा। आज आंसुओं का वो सैलाब नज़र आया मानो किसी अपने को ही हम सबने खो दिया। ऐसा कुछ कर गुजर गई हमारी सबकी चांदनी ने।

आज कभी न भूलने वाला दिन है। मौत के बाद साज-सज्जा कोई मायने नहीं रखती पर आज श्रीदेवी लाल बनारसी साड़ी में फूलों के साये में कुछ यूं ही एक ख़ूबसूरत दुल्हन के रूप में नज़र आयी मानो बस अब बोलने वाली है और जैसे उनके प्रशंसक उनका दीदार करना चाहते हैं। उनकी तस्वीर जीवन्त लग रही थी। शाम 5 बजे विले पार्ले में रीति-रिवाजों के साथ उन्होंने आख़िरी विदाई ले ली।

वो ऐसा एकमात्र कोहिनूर थी, जिसने उत्तर भारत और दक्षिण भारत के दिलों को जीत लिया था। जो काम आजतक कोई नहीं कर पाया चाहे वो एनटी रामाराव, रजनीकांत, महानायक अमिताभ बच्चन, सलमान ख़ान, शाहरूख़ ख़ान, रेखा, माधुरी या राजेश ख़न्ना ही क्यों न हों। उन्होंने उस जमाने में वो पहचान कायम की, जब समाज पुरुष प्रधान था न सिर्फ़ फिल्में बनाने के रिस्क को तोड़ा साथ ही नायिका प्रधान फिल्मों का आगाज करने के साथ-साथ सम्पूर्ण भारत की पहली महिला सुपरस्टार बनीं। एक पीढ़ी के लिए जो चांदनी थी तो दूसरी के लिए मॉम। सौन्दर्य और कलाकारी ने ऐसा जादू बिखेरा, जो हमेशा गुलज़ार रहेगा। कहते हैं न दिमाग के साथ खूबसूरती नसीब वालों को ही नसीब होता है, तभी तो श्रीदेवी ‘beauty with brain’ होने के साथ ही बॉलीवुड की पहली महिला सुपरस्टार हैं, थीं और रहेंगी।

कितना अज़ीब इत्तेफ़ाक है आज के ही दिन 28 फरवरी, 1997 को जुदाई फिल्म रिलीज़ हुई और आज 28 फरवरी, 2018 यानी 21 वर्षों के बाद वो असली जुदाई करके चली गयीं। सच कहा जाता है चांदनी उजाले को लाती है पर जब वो ही चांदनी छंटती है तो होता है तो बस अंधेरा। आज वो उस चिरनिद्रा में हमेशा के लिए सो गई। अभिनय के माध्यम से कोई हमारी रूह के तारों को इस तरह तरंगित कर जाता है, ये आज महसूस हुआ। फिल्म का डॉयलाग “भइया, जिन्द़गी दो दिन का खेला है” आज असल मायने में सच हो गया। सच आज मेरी कलम भी रो रही है। ऐसी शख़्सियत को जीत का शत्-शत् नमन व वन्दन। आप हमेशा मेरी रूह में यादों में क्योंकि आपको भुलाना तो नामुमकिन है। बस आख़िरी शब्द – “I LOVE YOU FOREVER”.

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