इंसानियत कहां गुम हो गई।

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हाय रे इंसान क्या कहूं तेरी तारीफ़ में,

तूने तो अपना वज़ूद ही बदल दिया।

न जाने तेरी वो शिफ़त कहां गुम हो गई,

तभी तो तूने अपनी पूरी ताबीर ही बदल दिया।।

कहीं 8 साल की बच्ची से बलात्कार,

तो कहीं सरेराह फूलों पर अत्याचार।

न जाने तेरी वो फिक्र कहां गुम हो गई,

तभी तो तूने मासूमियत का भी क़त्ल कर दिया।।

ख़ार बनकर ज़लज़ला लाता है तू अब,

शायद तू अब पूरी तरह मग़रूर हो गया।

न जाने तेरी वो जिन्द़गी की नफ़ासत कहां गुम हो गई,

तभी तो तूने रंजिश का चोला ओढ़ लिया।।

ख़ुद को कभी उस जगह रखकर महसूस तो कर,

शायद तू अब शैतान बन गया।

न जाने तेरी वो दिलनसारी कहां गुम हो गई,

तभी तो तूने हर किसी का गला घोंटना सीख लिया।।

काय़नात की सर्वश्रेष्ठ कृति होने का,

शायद तुझमें गुमान घर कर गया।

न जाने तेरी वो अच्छाई कहां गुम हो गई,

तभी तो तूने इंसानियत को भी मार दिया।।

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