आशिफ़ा बनो !

0
69
views
आशिफ़ा
  • सलोनी प्रिया 

किसको प्यार बुलाऊँ मैं
तुम्हारे टटोलने को
ये टटोलना की शायद ये आखिरी
किस्सा होगा
हर बार की तरह
अब्बा मैं आशिफ़ा
ज्यादा बोल नहीं सकती
बस आँशु निकल रहे हैं
दर्द बहूत है…… और डर भी……
किस बात की माफी मांगू इनसे कि
ये मुझे छोड़ दें……

मेरी सांसे इन जानवरों की
हैवानियत भरी हंसी में कैद हो
रही है
कि शायद तुम भी अब सोचोगे……
भरोसा कैसे करूँ इंसानो का
जब भगवान भी इनका साथ
निभाता रहा !!!

अब शायद तुमने भी शायद सोच होगा
कि गर मैं दरगाह में होती तो
अल्लह मुझे बचा लेते???
पर क्या सच मे बचा लेते???
काश काश के मैं अंजली होती….
क्यों ये अन्तर….. मेरी जिंदगी ले
गई ???
एक और अंतर था अब्बा…..बताऊँ ???
एक “आ” का अंतर ….
आशिफ और आशिफ़ा का
एक “ई” का अंतर….
बेटी और बेटे का ।।
पर मेरी क्या गलती???
मैंने तुम्हें बहुत पुकारा था
अब्बा…अब्बा…अब्बा……बहुत चिल्लाई
थी…….

शायद वो आदमी किसी का बाप न
था…..
मैं हार गई…….
वो इंसान भी न था…..अब्बा
मैं हार गई…….
और अब जब मैं मरने ही वाली
हूँ……

तुम रोना मत
क्योंकि पता है न तुम्हे…….
में पहली नहीं….
ना आख़री हूँ….
फिर क्यों ये ढोंग कर रहे हो
मोमबत्तियां लेकर…..
जाओ जाकर सो जाओ
कि तुम सबकी आशिफ़ा मेहफ़ूज़ रहे
मैं नहीं रह पाई तो क्या हुआ….
सो जाओ!!✍✍✍

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here