आपकी प्यारी -अंकुर

0
267
views
लड़की अंकुर
  • गोपाल यादव

मैं एक लड़की हूँ। मैं एक बेटी हूँ। मैं एक बहन हूँ। किस्मत रही तो आगे चलकर एक पत्नी भी बनूँगी। बच्चों का सुख मिला तो एक माँ भी बनूँगी। जब मेरा जन्म हुआ था सभी के चेहरे पर बेहद खुशी थी। मेरे पापा छुटियाँ लेकर आये थे। मेरे आने से माँ जो पीड़ा सहनी पड़ी थी उसकी लाख गुना खुशी उनके चेहरे पर झलक रही थी। पापा तो सारे मुहल्ले में मिठाईयाँ बाँट रहे थे।

इन सबसे इतर मेरा बड़ा भाई और मेरी बड़ी बहन लगातार मुझे गोद मे लेना चाह रहे थे। मैं बस रो रही थी। कभी कभी टुकुर टुकुर निहारने भी लगती थी सबको। मैं भी ख़ुश थी इतने सारे चेहरों की खुशी देखकर। मम्मी पापा ने बड़े ही लाड से रखा मुझे मुझे। जैसे जैसे बड़ी हो रही थी मेरे भाई और बहन से मेरा लगाओ और बढ़ता जा रहा था।

आये दिन भइया कुछ न कुछ मेरे लिए ले आते। वो मुझे प्यार से अंकुर बुलाया करते थे। मैं उनकी बहुत लाडली थी। हम छह भाई बहनों में वो सबसे बड़े थे और शायद सबसे ज्यादा मुझे प्यार करते थे। कुछ भी ले आते पहले मुझे ही पुकारते। कुछ काम होता तो भी मुझे ही बुलाया करते। सारे घर में मेरा ही नाम गूँजता रहता था। बस अंकुर!अंकुर! और केवल अंकुर! मैं ख़ुद को बहुत ख़ुशनसीब समझती थी कि मैं ऐसे घर मे जन्मी जहाँ मुझे इतने सारे लोग चाहने वाले हैं।

मेरी अपनी बड़ी बहन से थोड़ा कम बनती थी। हमेशा उनसे झगड़ा हो जाया करता था। मेरी एक छोटी बहन भी थी जिसपर मैं अपने बड़े होने का रौब जमाया करती थी। दो और बड़े भाई थे जो मुझे हमेशा सताया करते थे। कुछ भी होता था तो बड़े भइया हमेशा मेरी ओर से खड़े हो जाते थे। पूरे घर का माहौल ख़ुशनुमा बना रहता। कभी कभी जब मैं अकेले बैठा करती तो सोचती की अगर मैं इस घर में न जन्मी होती तो मेरा क्या होता। क्या कभी मुझे ऐसे भाई बहन और ऐसे माँ बाप मिल पाते। सोच कर ही रूह कांप जाती थी। मन बेचैन हो जाता था। और मैं फिर भागती हुई सबके पास चली जाती कि इन ख़यालों से दूरी बना सकूँ।

अब स्कूल तो जाने ही लगी थी मैं। स्कूल से आती तो बढ़िया बढ़िया खाने को मिलता और साथ ही सभी घरवालों का इतना प्यार और दुलार मिलता था कि हमेशा खाना ओवरडोज़ हो जय करता था। ख़ुशी ख़ुशी दिन बीतते रहें और मैं कब आठवीं पास कर गयी मालूम ही नहीं रहा। आठवीं तो पास कर ली अगर मैं अब भी वही चुलबुली बच्ची हुआ करती थी जो मैं पहले अपने घरवालों के लिए थी। मगर इसी बीच मुझे आगे की पढ़ाई के लिए दूसरे स्कूल में जाना पड़ा।

घर से तक़रीबन पांच मील दूर एक स्कूल में भइया ने दाखिला कर दिया था। रोज का आना जाना हुआ करता था। शुरुआत में सब कुछ बड़ा अजीब सा लग रहा था। सब लोग नए थे। सब पराये से लग रहे थे। किसी से कुछ ख़ास बोलचाल भी नहीं होती थी। यूँ तो मैं बड़ी जल्दी ही लोगों से घुल मिल जाती थी मगर वहाँ थोड़ा समय लगा।

कुछ दिनों में सब अपने से लगने लगे। अब कई नए दोस्त भी बन गए थे। ज्यादातर लोगों से बातचीत होने लगी थी। पढ़ाई भी बढ़िया चल रही थी। कुछ दिनों बाद पापा छुट्टी पर आये तो मुझसे स्कूल के बारे में पूछा। मैंने कहा अब ठीक चल रहा है। पापा इस बार कई दिनों बाद आये थे तो बोले चलो कल हम लोग घूमने चलते हैं। हम सभी लोग घूमने गए। सभी ने ख़ूब मजे किये। सभी ने शॉपिंग की और लौट आये।

मैं हमेशा ही तरह स्कूल जाने लगी। अब कुछ बहुत अच्छा चल रहा था। मैंने अब बेस्ट फ्रेंड भी बना लिए थे। इसी बीच मुझे एक लड़का दिखा। मेरे ही क्लास का था। मगर उसमें बात ही कुछ और थी। वो औरों से ज़ुदा था। उसकी पर्सनालिटी ही बिल्कुल अलग थी। काफी अट्रैक्टिव था।

मैं उसको देखते ही पसंद लर बैठी। उसके बारे में सब जानना चाहती थी। मालूम करने पर पता लगा कि उन ज़नाब की पहले से ही किसी और लड़की में दिलचस्पी थी और दोनों रिलेशनशिप में थे। साथ ही ये भी मालूम हुआ कि काफी घमंडी टाइप का बन्दा है। मैंने खुद को समझाया कि यहाँ पढ़ने आई हूँ तो उसी काम मे दिलचस्पी लूँ तो बेहतर होगा। इन सबसे मुझे दूर ही रहना है।

मैं ख़ुद को समझाबुझा कर पढ़ाई में मन लगा रही थी मगर जब भी वो सामने आता, एक पल को तो मैं उसी को देखने लगे जाती। धीरे धीरे मैंने खुद को क़ाबू किया। इसी बीच हमारे घर को नजाने किसकी नज़र लग गयी। पापा और भइया में अनबन हो गयी। घर में जो खुशी का माहौल हुआ करता था, कहीं खो सा गया। समय के साथ जिंदगी बढ़ रही थी मगर भइया और पापा में सुलह न हो सकी। धीरे धीरे सभी अपने अपने काम में लग गए। पापा और भइया दोनों तो हम लोगों से अब भी उसी तरह बात करते थे और उतना ही प्यार करते थे। हाँ आपस मे बात नहीं किया करते थे। थी तो मैं एक लड़की मगर भइया ने मेरा नाम लड़कों वाला नाम रखा था- अंकुर। घर के सभी लोग मुझे इसी नाम से पुकारा करते थे।

मैं दसवीं में आ चुकी थी। बोर्ड परीक्षा नजदीक थी। कुछ दिनों में वो भी खत्म ही गयी और चढ़ महीनों बाद ही रिजल्ट भी आ गया। मन मुताबिक तो रिजल्ट नहीं था मगर फिर भी बहुत अच्छा था। छुट्टियों के बाद जब वापस स्कूल जाना हुआ तो मुझे वो लड़का नहीं दिखाई दिया। सोचा आज नहीं आया होगा। हफ्ते बीत गए मगर वो अब भी नदारद था। मैंने अपने दोस्तों से पूछा तो मालूम हुआ की अब वो इस स्कूल में नहीं रहा। वो आगे की पढ़ाई कहीं और से करेगा। मैं एकदम से उदास पड़ गयी। मगर जल्द ही मैंने खुद से कहा चलो अच्छा ही है चला गया। अब उसे नहीं देखूँगी तो उसे भूलना आसान होगा। कुछ दिनों बाद मुझे मालूम पड़ा कि उसका उस लड़की से ब्रेकअप हो चुका है।

मुझे न तो इस बात की खुशी हुई और न ही दुःख। सब ठीक चल रहा था। कुछ डेढ़ महीने बीते होंगे कि एक दिन सुबह सुबह पहली क्लास चल रही थी, वो इंग्लिश की क्लास हुआ करती थी, अचानक से उसकी एंट्री होती है। मेरा दिल धक से रह जाता है। मेरे होंठों पर मुस्कान आ गयी। कुछ महीने बीते ही थे कि मेरी एक दोस्त ने मुझे बताया कि वो लड़का मुझको पसंद करता है।

मेरी तो खुशी का ठिकाना ही नहीं रहा मगर बाहर से दिखाने के लिए मैं शॉकड होने का दिखावा कर रही थी। वो मुझसे रोज किसी न किसी बहाने से मिलने की फिराक में रहता मगर मैं दूर से ही कट जाया करती थी। ऐसा नही था कि मैं भाव खा रही थी बल्कि मैं तो इन सबसे बस दूर रहना चाह रही थी मगर मन ही मन मैं ये कह रही थी कि मैं इसके प्रपोजल का जवाब कैसे दूँगी।

कहीं मौका न पाकर उसने एक दिन स्कूल से घर जाते वक्त रास्ते मे सभी के सामने मुझे प्रोपोज़ कर दिया। मैं शरमा गयी और केवल मुस्कुरा ही रही थी। वो भी मुस्कुराये जा रहा था। मैं बहुत खुश थी कि जिसे मैं इतने सालों से पसंद करती थी और कह नही पायी थी उसने ख़ुद मुझे प्रोपोज़ किया है। चूँकि उस समय मेरे पास फ़ोन नहीं था तो उसने मुझे ख़त लिखा। उस ख़त को मैंने नजाने कितनी बार चूमा था और बार बार उसे गले से लगा रही थी। मैंने भी उसे जवाब में खत लिख दिया। खातों के सिलसिला बढ़ चला। मगर…
एक दिन मेरे भइया को उसका लिखा ख़त मिल गया।

उन्होंने मुझे कुछ नहीं कहा मगर ख़त को फाड़ कर अपने पर्स में रख लिया। मम्मी को भी ये बात मालूम पड़ गयी। ख़ूब डाँट पड़ी थी उस दिन। मेरा स्कूल जाना बंद हो गया था। एक हफ्ते के बाद जब मैं स्कूल गयी तो काफी उदास थी। मैंने अपने दोस्तों से बताया कि घर मे मेरे और उसके बारे में मालूम हो गया है और आज भइया स्कूल भी आएंगे उससे मिलने। भइया आये और प्रिंसिपल आफिस में हम दोनों को बुलाया गया। वहाँ काफी जिल्लतें सहने के बाद हमें क्लास में जाने को कहा गया। उस दिन से मेरी उससे बात होना बंद हो गई और भइया से भी…

कुछ हफ़्तों बाद मेरी उससे फिर से तो बात होने लगी मगर लाख कोशिशों के बाद भी भइया मुझसे बोल तक नहीं रहे थे। पहले तो दिन भर बस अंकुर का ही नाम उनकी जुबां पर रहता था मगर अब तो गलती से भी वो मेरा नाम नही लेते थे। मुझे बहुत बुरा लग रहा था। एक ही घर मे रहकर के वो मुझसे बात नहीं करते थे। मैं ये सहन नहीं कर पा रही थी। कहते हैं कि अगर रोज ज़हर भी नियत मात्रा में दी जाए तो उसकी लत लग जाती है, उसी तरह अब मुझे आदत सी पड़ गयी थी उनके बात न करने की। मगर मैं अब भी सोचा करती थी कि कभी न कभी तो भइया कहेंगे ही कि ‘बस अंकुर बहुत हुआ।’

हालात बद से बदत्तर होते जा रहे थे। मेरी हर एक आस और उम्मीद, भरोसा और विश्वास तब और टूट गए जब पिछले महीने भइया ने मुझ पर हाथ उठाया। मुझे नहीं मालूम कि वो उस दिन किस्से नाराज़ थे, किस बात की चिढ़ थी, या क्या पता मुझसे की नाराज़ रहे हों। जिंदगी में पहली बार उन्होंने मुझपर हाथ उठाया था। हमेशा मुझे प्यार ही दिया है। कोई परेशान करता तो मेरा ही पक्ष लिया करते। मेरा सारा जीवन एक वक्त तक मेरे आंखों के सामने घूमने लगा जब भइया ने मुझपर हाथ उठाया।

आज भी मैं बस आँसू के घूँट पी रही हूँ। अपने ही घर मे बेगानों से हो गयी हूँ। स्कूल के बाद से उससे भी बात नहीं हो पाती। मैं अपने ही घर मे सबके होते हुए भी अकेली सी हो गयी हूँ। कभी सोचती हूं क्या मैं वही अंकुर हूँ जिसने जनमते ही सबके चेहरे रौशन कर दिए थे। क्या मैं वही अंकुर हूँ जिसे हमेशा से घरवालों से और ख़ास कर भइया ने बहुत प्यार दिया था। आज मैं बस टूटकर रह गयी हूँ। जीना मजबूरी और बोझ से लगता है। अब बस मैं, मेरे ख़याल और मेरे आँसू ही रह गये हैं।

– आपकी प्यारी अंकुर

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.