आज नहीं कल

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आज नहीं कल की आदत काँच सरीखे उन ख़्वाबों की तरह होते हैं, जिस पर न जाने कब कौन पत्थर का इक टुकड़ा उठाकर चला दे और सब चकनाचूर हो जाये। आज नहीं कल की आदत हमें अपने मुकाम से दूर लेती जा रही है।

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