आखिर क्यूं ?

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  • अंकिता मिश्रा

मैं हवा का वो झोंका हूं,
जो तेरे दुपट्टे से लिपट कर,
तेरी खुशबुओं में सिमट कर,
कुछ पूरा सा महसूस करता हूं,
तेरी चूड़ियों की खनखन से,
तेरी पायल की छनछन से,
बिना किसी की परवाह किए बगैर,
मैं बेवजह खिंचा चला आता हूं,
आखिर क्यूं मेरी फीकी सी चाय में,
तुम शक्कर बनके आ जाती हो।।।।

मैं वो सुर हूं,
जो तेरी सुरीली आवाज़ से होके गुज़रता हूं,
तेरे होठों के खुलने का इंतजार करता हूं,
और दुआ करता हूं तेरे अल्ला से,
पल भर और ठहर जा,
तेरी आवाज़ से निकले हर एक सुर को मैं,
अपने दिल की तिज़ोरी में रखना चाहता हूं,
चाहता हूं ये पल बस पल भर के लिए ठहर जाए,
लेकिन सोचता हूं:-
आखिर क्यूं मेरे बेजान सी संगीत में तुम,
सरगम बनके आ जाती हो।।।

मैं वो अंधेरी रात हूं,
जो तेरे बालों से लिपट जाता हूं,
ढूंढता हूं अपने आप को,
पर मिल नहीं पाता हूं,
तेरे जीवन की हर एक अंधेरी रात को,
मैं उजाले से भरना चाहता हूं,
कोशिश करता हूं,
पर नाकामयाब हो जाता हूं,
अंधेरी रात में चलने की आदत डालता हूं,
पर तेरी आंखों की चमक से,
रोशनी की तरफ खिंचा चला आता हूं,
कयी बार मैंने देखा और पाया फिर सोचा,
आखिर क्यूं मेरी अंधेरी जिंदगी में तुम,
रोशनी बनके आ जाती हो।।।।।

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