आख़िर कब तक?

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  • जीतेन्द्र पाण्डेय 

आसाराम, चैतन्य, फलाहारी और रामरहीम जैसे न जाने कितने बाबा और इस समाज में रह रहे हैं, जो अपनी अजरावस्था के बावजूद भी कामवासना और विकृति मानसिकता से पूर्णतया जकड़े हुए हैं और लोगों की आस्था का नाजायज़ फ़ायदा उठा रहे हैं। एक बार फिर से दिल्ली के रोहिणी के विजय विहार इलाके में आध्यात्मिक विश्वविद्यालय के नाम से आश्रम चलाने वाला वहशी और जिस्म का भूखा बाबा वीरेन्द्र देव दीक्षित की विकृति सोच ने न जाने कितनी मासूमों और कितनी जिंदगियों को बर्बाद करके रख दिया। न्यूड लड़कियों से मालिश कराने का शौक और 16,000 महिलाओं के साथ संबंध बनाने की चाह रखने वाले इन जैसे बाबाओं की आख़िर कब तक बाजार यूं ही चलती रहेगी। क्या लोग आज 21वीं सदी में भी आकर इनकी काली करतूतों से वाकिफ़ नहीं है? आख़िर क्यों उनको इन बाबाओं के ऊपर अपने पुरुषार्थ से ज्यादा यकीन होता है? यही वज़ह है, जो ऐसे दरिन्दों का वज़ूद और साहस दिन-ब-दिन अपने चरम पर पहुंचता जाता है। कई धाराओं में मुकदमे दर्ज़ किए जाते हैं। उन्हें उनके किए की कानून सज़ा भी देता है परन्तु सवाल यही है कि क्या इससे उस पीड़िता के घाव भर जाते हैं? इन बाबाओं का व्यापार आख़िर कैसे और कब तक फलता-फूलता रहेगा?  इनके दरिन्दगी के खेल को कब तक प्रश्रय मिलता रहेगा? बर्बाद की गई कलियां क्या कभी फिर से फूल बन पाएंगी? क्या उनकी जिंदगी भी एक आम लड़की की जिंदगी की तरह खिलखिलाएगी? ऐसे ही न जाने कितने अनगिनत सवाल हैं? जिनका जव़ाब शायद ही किसी के पास मिले। हद तो तब तो हो जाती है, जब इन सब पर नेताओं की ओछी टिप्पणियां आती हैं।

एक समाज का सृजन हम जैसे कई लोग मिलकर करते हैं। हम सभी जानते हैं कि उस सृजनकर्ता ने हम सभी को एक समान गुणों से परिपूर्ण करके इस वसुन्धरा पर भेजा है तब हम क्यों किसी मानव को खुदा समझकर उस पर आंख मूंदकर विश्वास कर लेते हैं?  क्यों हम अपने कर्मों पर विश्वास न करके मानव-पूजा करने लगते हैं? व्यक्ति अपने कर्मों से ही महान बनता है तो हम क्यों उसके कर्मों की जगह उसके द्वारा दिखाए गए या बताए गए अंधविश्वास पर यकीन करने लगते हैं? क्यों हम जल्दी से कुछ भी पा लेने की चाहत रखते हैं? इन सभी प्रश्नों का जवाब हम सभी को ढ़ूंढना होगा ताकि हम अपनी बेटी, बहन और मां को इस समाज में व्याप्त गिद्ध नज़र और वासनायुक्त सोच से बचा सकते हैं। हमें मासूम-सी बच्चियों के रुदन की असहनीय वेदना को महसूस करना होगा। हमें गुणात्मक शिक्षा पर जोर देना होगा। बच्चों को ऐसी तालीम देनी होगी, जिससे वो एक सुदृढ़ और स्वस्थ मानसिकता से भरे समाज का निर्माण करें। मां-बाप को तो इस धरती में भगवान का दर्जा प्राप्त है तो उनको इस बात का भी इल्म होना जरूरी है कि वो समाज में फैले अंधविश्वास से खुद को और अपने बच्चों को बचाने के साथ ही जागरूक करें, उन्हें संबल दें साथ ही उन्हें कर्म के महत्व से अवगत कराएं क्योंकि यथार्थ में तो बिना कर्म के कुछ हासिल नहीं होता। क्या एक बाबा हमको उस परमात्मा से मिला सकता है, जिसका खुद इन्द्रियों पर नियन्त्रण नहीं है? बाबाओं के बागों को हम ही गुलजार होने देते हैं, फलने-फूलने देते हैं। उसकी वज़ह है आस्था पर मेरा मात्र एक ही प्रश्न है क्या कोई आस्था या कोई भी भगवान किसी मासूम या किसी महिला से संबंध बनाकर उसकी जिंदगी को नर्क बना देने को कहता है। आपको जानकर हैरत होगी कि मैंने एक बहुचर्चित शहर के चर्चित मेले के आयोजन के पश्चात् वहां के बाबाओं के आश्रमों के नीचे की मिट्टी से बहुतायत मात्रा में कण्डोम और आपत्तिजनक वस्तुएं देखी हैं। क्या आप सभी को अब भी लगता है कि ये बाबा उस ईश्वर के सच्चे अनुयायी है या आपकी आस्था की परवाह करने वाले सच्चे साधक हैं? मैं नहीं कहता कि आप इनको मत मानिए पर ज़रा एक बार यह सोचकर देखिएगा, अपने दिमाग और नज़र को खोलकर समझिएगा जवाब आपको खुद-ब-खुद मिल जाएंगे कि आपको खुद पर विश्वास करना चाहिए या इन बाबाओं पर।

सनातन धर्म का चौथा आश्रम सन्यास होता है परन्तु सन्यास का अर्थ भोग-विलासितापूर्ण जीवन चाहे वो संभोग हो या काजू-बादाम सरीखे उच्च स्वादिष्ट पकवान कदापि नहीं होता। अरे सन्यास तो मोह-माया से विरक्ति का माध्यम होता है तो क्या आपको लगता है कि समाज में विद्यमान बाबाओं की श्रृंखला सन्यास के सच्चे अर्थों पर अमल करती है। क्या ये अपनी सुख-सुविधा को नजरांदाज करते हैं? जागिए, निस्संदेह जगिए अन्यथा इंसानियत तो मर ही रही है, कहीं खुद जिन्दा लाश न बन जाएं।

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I'm so keen person to learn from anyone. I write poems, short stories, articles and so other write-ups. I won many essay competitions. I've awarded many times by Pratiyogita Darpan for Hindi & English essay competitions. I won Jagran Young Editor competition and has been a MP in DJYP. I do anywork without thinking about result because i believe as a human only work is our hand recess god know that's why i try to give my 100% in any work. For contact me : jitendrapandeyrock@gmail.com in facebook ; Jitendra pandey
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